पोलियो और रैबीज में तो यही सीरम इस्तेमाल होता है
आईसीएमआर के वरिष्ठ वैज्ञानिक बताते हैं कि पोलियो और रेबीज के टीके में भी सीरम ऐसे ही जानवरों का लिया जाता है। उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि कोवाक्सिन टीके में बछड़े के सीरम को लेकर हो रहा विवाद महज राजनीतिक है। उन्होंने इस पर कोई भी टिप्पणी करने से इंकर कर दिया। लेकिन उनका कहना है कि साइंस तो अपना काम करेगी ही। उन्होंने कहा कि मेडिकल साइंस में किसी भी वायरस को खत्म करने के लिए तैयार की जाने वाली वैक्सीन में जब तक हम कोशिकाओं को तैयार करके उनके अंदर संक्रमित वायरस नहीं डालेंगे और उसका असर नहीं देखेंगे तब तक वैक्सीन का निर्माण हो ही नहीं सकता। कोशिकाओं का विकास करने के लिए हाई वैल्यू प्रोटीन सीरम की आवश्यकता होती है और यह हाई वैल्यू प्रोटीन सीरम घोड़ा, भैंस और बछड़े जैसे कई अन्य जानवरों से ही मिल सकता है। इसलिए इनका इस्तेमाल करके ही सबसे सुरक्षित वैक्सीन बनाई जाती है।
प्रोफेसर राकेश सहगल कहते हैं कि जब वैक्सीन की अंतिम चरण की प्रक्रिया होती है जिसमें उत्पाद बनकर तैयार होता है उस वक्त तक किसी भी तरह का सीरम तो बचता ही नहीं है। उनका कहना है कि अगर सीरम बचेगा तो वैक्सीन बन ही नहीं सकेगी। वह कहते हैं कि पानी और रसायनों से अच्छी तरह से साफ किया जाता है। इसके बाद तैयार की गई कोशिकाओं को कोरोना वायरस से संक्रमित किया जाता है। जिससे उन कोशिकाओं में वायरस विकसित हो सके और उस पर तैयार की गई दवा का ट्रायल हो। जो बाद में लोगों की जान बचा सके।