केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव और पूर्व वन एवं पर्यावरण मंत्री व कांग्रेस नेता जयराम रमेश रविवार को नए वन संरक्षण नियम-2022 को लेकर ट्विटर पर भिड़ गए। रमेश ने आरोप लगाया कि नए नियमों के जरिये मोदी सरकार आदिवासियों और ग्राम सभा के अधिकार छीन लेगी। इनसे वन अधिकार अधिनियम भी कमजोर होगा। इस पर पलटवार करते हुए केंद्रीय मंत्री यादव ने जवाब दिया कि नए नियमों से आदिवासियों का जंगल पर अधिकार नहीं छीना जाएगा। न किसी अन्य कानून, नियम या प्रावधान को इन नियमों के जरिये कमजोर किया जा रहा है। यादव ने जवाब की झड़ी लगाते हुए कांग्रेस नेता के आरोपों का सिलसिलेवार जवाब दिया। इस पर रमेश ट्विटर पर बहस को बीच में ही छोड़कर चले गए।
आरोप: कुछ खास उद्योगपतियों के हित में सरकार बदल रही है नियम
कांग्रेस नेता रमेश ने लिखा कि करोड़ों आदिवासियों के हक छीनने के लिए नए नियम लाए जा रहे हैं। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 2009 में नियम बनाकर सुनिश्चित किया था कि जंगल की जमीन का स्वरूप व उपयोग बदलने के लिए मंत्रालय को वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत आदिवासियों व वन में रहने वालों के अधिकार सुरक्षित करने होंगे। नए नियमों में सरकार पहले ही अंतिम मंजूरी दे देगी। इसके बाद अधिकार सुरक्षित करने पर बात होगी। ऐसा कुछ खास उद्योगपतियों के लिए जंगल की जमीन का उपयोग आसान करने के लिए हो रहा है।
कांग्रेस के मीडिया प्रभारी जयराम रमेश ने रविवार को एक बयान जारी करते हुए कहा है कि केंद्र सरकार ने हाल ही में अनुसूचित जनजाति और अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 (या जिसे सामान्य तौर पर वन अधिकार अधिनियम 2006 कहा जाता है) में कई ऐसे बदलाव किए हैं जिनके बाद किसी वन भूमि के उपयोग में बदलाव करने पर उस स्थान के मूल निवासियों से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य नहीं रह जाएगा, जबकि पूर्व के कानून में इसे बाध्यकारी बनाया गया था।
जवाब: कोई नियम-कानून और प्रावधान कमजोर नहीं होगा
केंद्रीय मंत्री यादव ने जवाब में कहा, नए नियम सुधारों के लिए जरूरी हैं। इनका उद्देश्य जंगल की जमीन के उपयोग से जुड़ी प्रक्रियाओं को बेहतर करना और निर्णय का समय कम करना है। इससे प्रक्रियाएं समानांतर चलाई जा सकेंगी। यह आरोप गलत जानकारी पर आधारित हैं कि नियम बाकी नियमों की परवाह न करते हुए बनाए गए। सरकार आदिवासियों के अधिकार संरक्षित करने के लिए समर्पित है। कोई कानून, नियम या प्रावधान इनसे कमजोर नहीं होगा। इन नियमों से 1980 के कानून के तहत जरूरी अनुमतियों की प्रक्रिया आसान होगी।
फिर शुरू हुए दावे-प्रतिदावे
जयराम रमेश ने लिखा, ‘मंत्री जी...मुद्दे से भटकाने की कोशिश न करें। क्या आप ग्राम सभा को अप्रासंगिक नहीं करने जा रहे? शायद आपको ठीक से बताया नहीं गया, नए नियम मोदी सरकार में जनजातीय मामलात विभाग द्वारा 2015 में जारी नोट के भी खिलाफ हैं।
भूपेंद्र यादव ने लिखा, ‘जयराम जी...आप ऐसी समस्या की ओर इशारा कर रहे हैं, जो है ही नहीं। वन अधिकार कानून को कमजोर नहीं किया जा रहा है। ऐसा मानना गलत है। बल्कि इस कानून का अनुपालन जंगल की जमीन के डायवर्जन से पहले करने की बात नए नियमों में साफ लिखी गई है। यह एक स्वतंत्र प्रक्रिया है, जिसे राज्य किसी भी चरण में कर सकते हैं, लेकिन डायवर्जन की सहमति से पहले प्रक्रिया पूरी करनी होगी। मुझे डर है कि कोई अगर यह बिंदु देखना ही न चाहे तो इसे नहीं देखेगा। मुझे अब और कुछ नहीं कहना।
इस जवाब के बाद जयराम रमेश ने कोई और तर्क नहीं रखा। हालांकि उनके ट्विटर अकाउंट से कुछ रीट्वीट किए गए।