फ्रीडम हाउस, एक स्वतंत्र एजेंसी है। वह डेमोक्रेसी की रेटिंग तय करती है। फ्रीडम हाउस ने भारत के लोकतंत्र की रैंकिंग को नीचे गिराया है। भारत को 'आंशिक रूप से स्वतंत्र लोकतंत्र' की श्रेणी में डाला है। फ्रीडम हाउस के अनुसार हिंदुस्तान की डेमोक्रेसी पूर्णतया स्वतंत्र नहीं है, आंशिक रुप से स्वतंत्र है। दूसरी रेटिंग एजेंसी, स्वीडन की वी-डैम है। वह कहती है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था चुने हुए निरंकुश शासन में तब्दील हो गई है। ये हम नहीं कह रहे, ये स्वतंत्र एजेंसियां बोल रही हैं, जो लोकतंत्र को आंकती करती हैं। सुप्रीम कोर्ट के सिटिंग जज बाहर आकर बोलें कि लोकतंत्र खतरे में है। दुनिया का हर देश जब डेमोक्रेसी को सीखता है, या सीखना चाहता है तो वह भारत की ओर देखता है, तब जब अमेरिका, भारत के लिए ऐसे शब्दों का उपयोग करता है तो हर हिंदुस्तानी का सिर शर्म से झुकता है।
पहले प्रधानमंत्री विदेश जाते थे, तो भारत की एनर्जी सिक्योरिटी को स्वावलंबी बनाने के लिए न्यूक्लियर डील साइन करके आते थे। पहले प्रधानमंत्री जी जाते थे, तो भारत के लोगों को एच-1वी वीजा में किस तरह सुविधाएं मिलें, इसकी बात करके आते थे। कांग्रेस नेता वल्लभ ने कहा, मुझे उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ अच्छे काम किए होंगे, क्योंकि मुझे कोई जानकारी नहीं है। इस तरह की टिप्पणियां हमें ही हमारे पूर्वजों द्वारा कही गई बातों को याद दिलाती हैं। दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति, ये मानती है कि जिस तरह से पिछले सात साल में संस्थाओं को चोट पहुंचाई गई है, पिछले सात साल में एक-एक करके संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किया गया है, उससे लोकतंत्र सुदृढ़ नहीं हो सकता। आज हमें महात्मा गांधी की सीख अगर कोई दूसरा सिखा रहा है तो इसको आपको सकारात्मकता से देखना होगा।