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Climate Change: 'इरादे सही, क्रियान्वयन पर ध्यान नहीं', मोदी 2.0 के पर्यावरण संबंधी रिकॉर्ड पर सुनीता नारायण

Wed, 19 Jun 2024 01:54 PM IST
मेघा झा न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने मोदी सरकार के दूसरे कार्य के पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के इरादे को सही बताया, लेकिन उन्होंने कहा कि इसके क्रियान्वयन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि सरकार ने इस हद तक पर्यावरण प्रणाली को कमजोर कर दिया है कि अब ये काम नहीं करतीं, सरकार को पुराने तरीकों से सीखने की आवश्यकता है।
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पर्यावरणविद् सुनीता नारायण - फोटो : पीटीआई
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विस्तार
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पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन से प्रभाव से चिंतित पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने सरकारी योजनाओं के बारे में खुलकर बात की है। उन्होंने कहा कि पिछली सरकारों ने इसके क्रियान्वयन पर ठीक प्रकार से ध्यान नहीं दिया। इस कारण यह प्रक्रिया बहुत कमजोर हो गई है। हालांकि मोदी सरकार ने इसके लिए नई परियोजनाएं बनाईं, लेकिन उनको ठीक प्रकार से लागू नहीं करा पाए। न ही आम जनता से उनकी राय ले पाए।
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शीर्ष पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने बताया कि मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में कई पहलों पर ध्यान केंद्रित किया। जिसमें नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाना, वन क्षेत्र में सुधार, मरुस्थलीकरण से निपटना, वायु प्रदूषण को कम करना, आर्द्रभूमि का संरक्षण, सभी घरों में पीने योग्य पाइप पेयजल उपलब्ध कराना और एकल-उपयोग प्लास्टिक का उन्मूलन शामिल है। उन्होंने कहा कि दूसरी मोदी सरकार के पास पर्यावरण क्षरण और जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सही इरादे थे, लेकिन क्रियान्वयन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। उन्होंने बताया कि यदि आप सरकार की नीतियों को गौर से देखें, तो आप यह तर्क नहीं दे सकते कि कुछ भी गलत था। नवीकरणीय ऊर्जा, पेयजल, अपशिष्ट प्रबंधन जैसे कई बिंदुओं पर विचार किया गया। सुनीता नारायण ने बताया कि सरकारों ने लगातार पर्यावरण मंजूरी प्रणाली को इस हद तक कमजोर कर दिया है कि यह अब काम नहीं करती। 

लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाए
भाजपा नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के लगातार तीसरे कार्यकाल के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि पिछले पांच वर्षों में वन, वन्यजीव और पर्यावरण कानूनों में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के महानिदेशक के अनुसार, पर्यावरण से संबंधित प्रमुख सरकारी कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने के लिए नई कल्पना की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि "सरकार के बहुत से कार्यक्रम ऐसे स्तर पर पहुंच गए हैं जहां हम लक्ष्य हासिल नहीं कर पाए हैं। उन्होंने बताया कि हम नदियों की सफाई के सवाल को लेते हैं। हम अपनी नदियों को साफ नहीं कर पाए हैं। अभी भी ऐसी स्थिति है कि जहां हम अपनी नदियों से साफ पानी ले रहे हैं वहीं उन्हें सीवेज वापस दे रहे हैं।"
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पुराने तरीकों पर वापस लौटने की आवश्यकता 
सुनीता नारायण ने कहा कि सरकारों को अब पुराने तरीके से विकास करना चाहिए। पुराने तरीके से विकास का मतलब जमीन से सीखना, अपना दृष्टिकोण बदलना और फिर से सीखना था। इसलिए इस इको चैंबर में, आपके पास कल्पना नहीं हो सकती।" उन्होंने कहा कि सरकार ने लोगों की बात सुनने और जमीनी स्तर पर हो रही घटनाओं से सीखना बंद कर दिया है।

फीडबैक पर ध्यान दिया जाना जरूरी
सरकारी परियोजनाओं में सुधार की बात करते हुए नारायण ने कहा कि कार्यक्रमों में नई कल्पना को शामिल करने के लिए फीडबैक एकत्र करना आवश्यक है। उन्होंने कहा,  हर बिंदु या स्थिति जो सहमत नहीं हो सकती है, असहमति बन जाती है। "यदि आप बताते हैं कि उज्ज्वला योजना, जो कि शानदार थी, लाभ नहीं दे रही है क्योंकि महिलाओं के पास रिफिल के लिए पैसे नहीं हैं, तो आप राज्य के दुश्मन नहीं हैं। इसके बारे में दो साल पहले सभी जानते थे, लेकिन अगर आप इस पर चर्चा करते हैं, तो इसका मतलब ये नहीं के आप उज्ज्वला कार्यक्रम के खिलाफ हैं।" उन्होंने कहा कि इस सरकार के मुकाबले पिछली सरकार नए विचारों को अपनाने का साहस नहीं रखती थीं, लेकिन वे उसकी कमियां और नए विचार सुनने का रास्ता खुला रखती थीं। "

पर्यावरण के लिए काम नहीं कर रही पर्यावरण मंजूरी प्रणाली
उन्होंने कहा कि देश में स्वच्छ नीला आकाश और नदियां नदियां साफ होना, सब सरकार की अपनी परियोजनाओं को लागू करने और कुछ असुविधाजनक निर्णय लेने की क्षमता पर निर्भर करता है। नारायण ने बताया, "पर्यावरण मंजूरी प्रणाली न तो पर्यावरण के लिए काम कर रही है और न ही विकास के लिए। यह केवल सलाहकारों या लेखा परीक्षकों और अन्य लोगों के लिए काम कर रही है। वे लोग जो परियोजनाओं को देखकर उन्हें मंजूरी देते हैं। उन्होंने कहा कि सभी सरकारों ने परियोजनाओं को मंजूरी दी है, कांग्रेस सरकार, यूपीए सरकार ने भी। लेकिन सभी सरकारों ने निर्णय लेने की प्रणाली को धीरे-धीरे कमजोर किया है। 

कट एंड पेस्ट दस्तावेज से ज्यादा कुछ नहीं आंकलन रिपोर्ट
सुनीता नारायण ने दावा किया कि अधिकांश पर्यावरण प्रभाव आकलन रिपोर्ट "कट-एंड-पेस्ट दस्तावेज़" हैं। उन्होंने कहा ये सारी चीजें प्रक्रिया को कमजोर करती हैं। उन्होंने कहा कि दस्तावेज़ आते है, एक समिति होती है, बिना चेहरे वाले लोग होते हैं, जिनकी कोई जवाबदेही नहीं होती। वे बैठकर तय करते हैं कि इस परियोजना को मंजूरी दी जानी चाहिए या नहीं। अब वे इसे मंजूरी कैसे देते हैं? वो ऐसे कि इसमें 100 शर्तें हैं जिन्हें लागू नहीं किया जा सकता। बिना उसकी वास्तविकता को जाने। अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार पर्यावरण मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालयों में कर्मचारियों की कमी है। उनके पास इस बात की जांच करने की भी क्षमता नहीं है कि उस शर्त को लागू किया गया है या नहीं।

परियोजनाओं की मंजूरी में समय किया जाता व्यर्थ
पिछले पांच वर्षों से सरकार का पूरा ध्यान इस पर रहा है कि प्रक्रिया को गति दी जाए। सुनीता नारायण ने कहा कि समय की बर्बादी अर्थशास्त्र के लिए बुरी है। उन्होंने कहा कि मैं मंजूरी पाने के लिए तीन साल की प्रक्रिया क्यों चाहूंगी? हर महीने परियोजना की लागत बढ़ जाती है। मैं एक प्रभावी, कठोर, सख्त निर्णय लेने की प्रक्रिया चाहती हूं, जो कि अच्छे-बुरे का संतुलन बनाए। पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया का उद्देश्य पर्यावरण और विकास के बीच संतुलन लाना था। 
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