हिमालय के 'चिपको आंदोलन' की तरह ही दक्षिण भारत में 'अप्पिको आंदोलन' को काफी मान्यता और ख्याति मिली है। इसे न केवल मीडिया में जगह मिली, बल्कि सरकारी महकमे में काफी सराहना मिली। कर्नाटक सरकार ने जंगल में हरे पेड़ों की कटाई पर पूरी तरह रोक लगा दी, जो आज तक जारी है।
हाल ही में मुझे अप्पिको आंदोलन के सूत्रधार पांडुरंग हेगड़े से मिलने का अवसर मिला। सिरसी स्थित अप्पिको आंदोलन के कार्यालय में उनसे मुलाकात और लंबी बातचीत हुई। करीब 34 साल बीत गए, वे इस मिशन में लगातार सक्रिय हैं। अब वह अलग-अलग तरह से पर्यावरण के प्रति चेतना जगाने की कोशिश कर रहे हैं। 80 के दशक में उभरे अप्पिको आंदोलन में पांडुरंग हेगड़े की ही प्रमुख भूमिका रही है। एक जमाने में वह दिल्ली विश्वविद्यालय से सामाजिक कार्य में गोल्ड मेडलिस्ट रहे हैं। अपनी पढ़ाई के दौरान वह चिपको आंदोलन में शामिल हुए और कई गांवों में घूमे, कार्यकर्ताओं से मिले।
चिपको के प्रणेता सुंदरलाल बहुगुणा से मिले। यही वह मोड़ था, जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। कुछ समय मध्य प्रदेश के दमोह में लोगों के बीच काम किया और अपने गांव लौट आए और जीवन में कुछ सार्थक करने की तलाश करने लगे। कुछ साल बाहर रहने के बाद गांव लौटे, तो इलाके की तस्वीर बदली-बदली लगी। जंगल कम हो रहे हैं, हरे पेड़ कट रहे हैं। इससे पांडुरंग व्यथित हो गए, उन्हें उनका बचपन याद आ गया। उन्होंने अपने बचपन में इस इलाके में बहुत घना जंगल देखा था। हरे पेड़, शेर, हिरण, जंगली सूअर, जंगली भैंसा, बहुत से पक्षी और तरह-तरह की चिड़ियाएं देखी थीं। पर कुछ सालों के अंतराल में इसमें कमी आई।
यह देखते हुए उन्होंने काली नदी के आसपास पदयात्रा की। उन्होंने देखा कि वहां जंगल की कटाई हो रही है। खनन किया जा रहा है। ग्रामीणों के साथ मिलकर कुछ करने का मन बनाया। सबसे पहले सलकानी गांव के करीब डेढ सौ स्त्री-पुरूषों ने जंगल की पदयात्रा की। वहां वन विभाग के आदेश से पेड़ों को कुल्हाड़ी से काटा जा रहा था। लोगों ने उन्हें रोका, पेड़ों से चिपक गए और आखिरकार, वे पेड़ों को बचाने में सफल हुए। यह आंदोलन जल्द ही जंगल की तरह फैल गया।
यह अनूठा आंदोलन था, यह चिपको की तरह था। कन्नड़ भाषा में 'अप्पिको' शब्द चिपको का ही पर्याय है।