मां ने कहा था, फायरिंग लाइन से दूर रहना
3 जुलाई 1999 को जब एलओसी स्थित बटालिक सेक्टर के गनासोक में सुबह हुई, तो बहादुर सैनिकों के शव स्लीपिंग बैग उन्हें घर रवाना करने के लिए हेली-लिफ्ट करने के लिए नीचे उतारे जा रहे थे। उनमें से एक 1/11 गोरखा राइफल्स (जीआर) के कैप्टन मनोज पांडे का भी शव था, उनके चेहरे पर वैसी ही मुस्कान थी, जैसी हमेशा उनके चेहरे पर होती थी। यहां तक कि कैप्टन मनोज पांडे ने अपनी मां की सलाह को भी नकार दिया था। उनकी मां ने कहा था, तुम अधिकारी हो, फायरिंग लाइन से दूर रहना। इस पर मनोज पांडे ने फोन कॉल पर अपनी मां को जवाब दिया था, "जिस तरह एक मां मुसीबत का सामना करने पर अपने बच्चे को पीछे रखती है, मुझे भी अपने गोरखा सैनिकों से आगे रहना है, जो मेरे बच्चों की तरह हैं।
प्रशस्ति पत्र का चाहिए था कंप्यूटर प्रिंटआउट
कैप्टन मनोज पांडे की 1/11 गोरखा राइफल्स (जीआर) के तत्कालीन सेकंड-इन-कमांड (2IC) लेफ्टिनेंट कर्नल अमूल अस्थाना, जो बाद में ब्रिगेडियर के पद से रिटायर हुए, उन्हें बहादुरी पुरस्कार के लिए प्रशस्ति पत्र (साइटेशन) लिखने का मुश्किल कार्य सौंपा गया था। अस्थाना बताते हैं, जुलाई के दूसरे हफ्ते में बटालिक सेक्टर के याल्दोर में एक और लड़ाई चल रही थी। वह थी प्रशस्ति पत्र लिखने की लड़ाई! ऑपरेशन में लगातार जवानों के शहीद होने की खबरें आ रही थीं। उस दौरान मुख्यालय 3 इन्फेंट्री डिवीजन ने आदेश दिया कि इन्हें कंप्यूटर प्रिंटआउट में, वर्ड स्टार IV में फ्लॉपी में एक सॉफ्ट कॉपी और डाटा डी बेस III प्लस में भेजा जाए।
गधों पर लाए गए कंप्यूटर और जनरेटर
रिटायर्ड ब्रिगेडियर अस्थाना बताते हैं, 16000 फीट पर दुश्मन की गोलियों का सामना कर रही हमारी बटालियन के लिए यह आदेश किसी झटके से कम नहीं था। इसके लिए कंप्यूटर को लेह से 100 किलोमीटर की दूरी पर हमारे पिछले बेस नूरला से याल्दोर (बटालिक) पहुंचाया जाया जाना था। साथ ही, कंप्यूटर चलाने के लिए डीजल और जनरेटर के अलावा युद्ध क्षेत्र में कंप्यूटर रखने के लिए एक अस्थाई वाटरप्रूफ शेल्टर बनाना भी शामिल था, जो किसी चैलेंज से कम नहीं था। उस समय हमारे पास आज की तरह हैवी ड्रोन नहीं होते थे। इसके लिए कार्रवाई शुरू की गई। 150 किलोमीटर दूर कारगिल में 3 डिवीजन के मुख्यालय से सॉफ्टवेयर और प्रशस्ति पत्र का फॉरमेट मंगवाने की तैयारियां शुरू की गईं। वहीं, कंप्यूटर को नूरला से दाह तक पहुंचाया और वहां से एक गधे पर कंप्यूटर मॉनिटर लादा गया, तो दूसरे गधे पर सीपीयू, जनरेटर और डीजल का ड्रम लदा था।
वह कहते हैं कि उस इलाके में पैदल चलना बेहद मुश्किल था। पूरा उबड़-खाबड़ इलाका, कठिन चढ़ाई और ऑक्सीजन की बेहद कमी और दुश्मन की भारी गोलाबारी से बचना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं था। एक बहादुर स्थानीय पोर्टर की निगरानी में दोनों गधे 12 घंटे की पैदल यात्रा के बाद याल्डोर तक पहुंचे। वहीं, 3 डिवीजन हेडक्वॉर्टर से जरूरी प्रशस्ति पत्र का फॉर्मेट प्राप्त करने का काम 24 जुलाई तक ही पूरा हो पाया। जिसके बाद याल्डोर में कंप्यूटर पर प्रशस्ति पत्र लिखे गए। इसमें कैप्टन मनोज पांडे के लिए पीवीसी (मरणोपरांत) का प्रशस्ति पत्र भी शामिल था।
खालूबार की लड़ाई बनी मिसाल
हालांकि कैप्टन मनोज पांडे ने वैसे तो कई खतरनाक मिशनों को सफलतापूर्वक निपटाया था। लेकिन खालूबार की लड़ाई सबसे बहादुर माने जाने वाले गोरखाओं के लिए भी बड़ी चुनौती थी। 2 जुलाई 1999 को कैप्टन मनोज पांडे की यूनिट 1/11 जीआर को खालूबार से दुश्मन की पोजिशन को क्लीयर करने का आदेश मिला। 22 ग्रेनेडियर्स की चार्ली कंपनी गोरखाओं से पहले खालूबार भेजी गई थी। तीन दिन तक उनकी कोई खबर नहीं थी। तीसरे दिन उनका मदद के लिए सिग्नल आया। मनोज पांडे की प्लाटून को खालूबार की चोटियों पर चढ़ने की जिम्मेदारी दी गई। वे नंबर 5 प्लाटून के कमांडर थे। 4 घंटे की लगातार चढ़ाई के बाद आखिरी चोटी की करीब 400 मीटर की दूरी थी, तो अचानक दो दिशाओं से ताबड़तोड़ गोलियां बरसने लगीं। पाकिस्तानी जानते थे कि अगर भारतीय फौज खालूबार को अपने कब्जे में ले लेगी तो पूरा युद्ध ही पलट जाएगा। उन्होंने एडी गन से भी फायर करना शुरू कर दिया, जो एक मिनट 1000 से ज्यादा गोलियां फायर करती है। 16 हजार 700 फीट की ऊंचाई पर रात की भयंकर ठंड में वे आगे बढ़ते रहे। पाकिस्तानी सेना मोर्टार फायर करने लगी। ये ऐसे बम होते हैं, जो हवा में भी फट जाते हैं, यानी झुककर बचने की भी गुंजाइश नहीं होती है।
बटालिक से पाकिस्तानी का नामो निशान मिटाया
कैप्टन मनोज पांडे किसी तरह से ऊपर पहुंचे, तो आकलन था कि वहां दुश्मन के सिर्फ दो बंकर होंगे। लेकिन वहां दो नहीं बल्कि 6 बंकर थे। चोटी पर बैठे पाकिस्तानी सेना के जवानों को शक हो गया था कि भारतीय जवान यहां पहुंच गए हैं। कुछ ही देर में दुश्मन ने हर कुछ मिनट बाद इल्युमिनेटिंग राउंड फायर शुरू कर दिए। इसे फायर करने के बाद करीब 3 मिनट तक रोशनी रहती है। मनोज पांडे ने सुबह होने तक का इंतजार नहीं किया। मनोज पांडे ने अपने जवानों को बड़ी सी चट्टान के पीछे छोड़ा और खुद बाहर निकले और दुश्मन की गन की पोजिशन की टोह ली। जय महाकाली के युद्धघोष के साथ उन्होंने बंदूक की गोली से निशाना साधा, जो ठीक लक्ष्य पर लगी और मशीन गन के पीछे बैठा पाकिस्तानी जवान वहीं ढेर हो गया। कैप्टन पांडे के कंधे और पैर में गोली लगी। घायल होने बाद भी वे अगले बंकर की तरफ आगे बढ़े और ग्रैनेड फेंककर उसे भी खत्म कर दिया। गोलियों से छलनी मनोज पांडे तीसरे बंकर में पीछे से घुसे, तो देखा कि दो पाकिस्तानी गोरखा जवानों पर गोली चलाने वाले हैं। उन्होंने अपनी खुखरी निकाली और उनकी गर्दन काट डाली। कैप्टन पांडे अब आखिरी गन पोजिशन की तरफ आगे बढ़े, उन्होंने बंकर के भीतर ग्रेनेड उछाला पर ग्रेनेड के गिरने और विस्फोट के बीच तीन से चार सेकेंड का फासला होता है, इतनी देर में तीन गोलियां मनोज के हेलमेट को चीरती हुई उनके सिर में घुस गईं। मनोज ने अपने पल्टन के जवानों से नेपाली में कहा 'न छोड़ नूं।' गोरखा जवानों ने उस दिन एक भी पाकिस्तानी सैनिक को चोटी से भागने का मौका नहीं दिया। खालूबार पर कब्जे के साथ ही, पाकिस्तान के पास जितने भी डिफेंसिव पोजिशन थे, वे उसे संभाल नहीं पाए औऱ उन्होंने दूसरी चोटियों से भी भागना शुरू कर दिया। मनोज ने जुबार, कुकरथाम और खालूबार जैसी मुश्किल चोटियों पर जीत का परचम लहराया। अपनी मां को लिखी आखिरी चिट्ठी में मनोज ने लिखा था, "कुछ लक्ष्य इतने नेक होते हैं कि इनमें असफलता भी यश लेकर आती है।"