बिहार विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी दल और चुनाव आयोग आमने-सामने हैं। हर दिन विपक्ष की ओर से चुनाव आयोग पर नए-नए आरोप लगाए जा रहे हैं। चुनाव तारीखों के ऐलान से पहले ही सियासी पारा चढ़ चुका है। इस चुनावी मौसम में अमर उजाला अलग-अलग सीरीज के जरिए बिहार की सियासत के बारे में बता रहा है। इसी से जुड़ी ‘सीट का समीकरण’ सीरीज में आज हम मधेपुरा विधानसभा सीट की बात करेंगे।
पहले जानते हैं मधेपुरा सीट के बारे में
बिहार के 38 जिलों में से एक मधेपुरा जिला भी है। जिले में चार विधानसभा सीटें आती हैं। इनमें आलमनगर, बिहारीगंज, सिंघेश्वर और मधेपुरा सीटें शामिल हैं। मधेपुरा विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र मधेपुरा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का भी हिस्सा है। मधेपुरा लोकसभा क्षेत्र में 6 विधानसभा सीटें हैं। इनमें आलमनगर, बिहारीगंज, मधेपुरा, सोनबरसा (एससी), सहरसा और महिषी शामिल हैं। मधेपुरा विधानसभा सीट पर 1957 में सबसे पहले चुनाव हुए थे।
1952 में त्रिवेणीगंज और मधेपुरा एक ही सीट थी। उस चुनाव में इस सीट पर दो विधायक चुने गए थे। इस चुनाव में कांग्रेस के बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल और भोली सरदार को जीत मिली थी।
1957 में मधेपुरा एक अलग सीट बनी
1957 में मधेपुरा एक अलग सीट बन गई। सीट पर निर्दलीय चुनाव लड़ रहे भूपेन्द्र नारायण मंडल को जीत मिली थी। उन्होंने कांग्रेस के बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल को 3,022 वोट से हरा दिया था। बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल को आप-हम बीपी मंडल के नाम से भी जानते है। मंडल आगे चलकर बिहार के सातवें मुख्यमंत्री रहे। इन्ही बीपी मंडल के नाम से बने मंडल कमीशन की रिपोर्ट के बाद पिछड़ा वर्ग को आरक्षण मिला।
1962 में कांग्रेस को मिली जीत
1962 में मधेपुरा विधानसभा सीट से कांग्रेस को जीत मिली। कांग्रेस के बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल ने सोशलिस्ट पार्टी के भूपनारायण कामत को 14,944 वोट से हरा दिया था।
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी को मिली जीत
1967 में सीट पर संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के एम.पी. यादव ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने कांग्रेस के आर.एन. प्रसाद को 14753 वोट से हरा दिया था। इस चुनाव के बाद बिहार की सियासत में कई उठपटक देखने को मिली। इसी उठापटक के बीच मधेपुरा के पूर्व विधायक बीपी मंडल 1 फरवरी 1968 को बिहार के मुख्यमंत्री बने। हालांकि, महज 50 दिन बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था।
भोली प्रसाद मंडल को जीत
1969 में मधेपुरा सीट से कांग्रेस को एक बार फिर से जीत मिली। कांग्रेस के भोली प्रसाद मंडल ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के कमलेश्वाकरी पी.डी. मंडल को 7,232 वोट से हरा दिया था।
1972 में एक बार फिर से बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल को जीत मिली। इस बार उन्होंने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से जीतकर कांग्रेस के तत्कालीन विधायक भोली प्रसाद मंडल को 22173 वोट से हरा दिया था।
जनता पार्टी के शासनकाल में बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया और इस आयोग ने भारत के सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के हितों के विषय में रिपोर्ट तैयार की थी। इस कमीशन को मंडल कमीशन के नाम से जाना जाता था। इस कमीशन का गठन साल 1978 में किया गया था और इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट 1980 में तैयार की थी। इस रिपोर्ट की सिफारिशें 1990 में वी.पी. सिंह सरकार ने लागू की थी। आज इसी रिपोर्ट के कराण नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण मिलता है।
जनता पार्टी को मिली जीत
1977 में मधेपुरा सीट से जनता पार्टी के राधाकांत यादव को जीत मिली। उन्होंने कांग्रेस के जय कृष्ण यादव को 21,899 वोट से हरा दिया था।
1980 में एक बार फिर राधाकांत यादव को जीत मिली। जनता पार्टी के टिकट पर उतरे राधाकांत ने कांग्रेस (आई) के मनिन्द्र कुमार यादव को 10,130 वोट से हरा दिया था।
भोली प्रसाद मंडल हुए विजयी
1985 में एक बार फिर से कांग्रेस से भोली प्रसाद मंडल को जीत मिली थी। कांग्रेस के भोली प्रसाद मंडल ने लोकदल के राधाकांत यादव को 395 वोट से हरा दिया था।
1985 में इस सीट पर उपचुनाव कराने पड़े। भोली प्रसाद मंडल के निधन के बाद इस सीट पर चुनाव की जरूरत पड़ी थी। उपचुनाव में कांग्रेस से राजेंद्र प्रसाद यादव ने 6,673 वोट से जीत दर्ज की थी।
1990: जनता दल को मिली जीत
1990 में जनता दल के राधाकांत यादव ने कांग्रेस के मनिन्द्र कुमार मंडल को 43,321 वोट से हरा दिया था।
1995 में भी मधेपुरा सीट से जनता दल के उम्मीदवार को ही जीत मिली थी। जनता दल के परमेश्वरी प्रसाद निराला ने कांग्रेस के राजेंद्र प्रसाद यादव ने 31,019 वोट से हरा दिया था।
2000: राजेंद्र प्रसाद यादव एक बार फिर जीते
2000 में एक बार फिर मधेपुरा सीट पर राजेंद्र प्रसाद यादव को जीत मिली। इस बार उन्हें कांग्रेस की जगह राजद से टिकट मिला था। राजद के राजेंद्र प्रसाद यादव ने जदयू के कपिलदेव मंडल को 35358 वोट से हरा दिया। राजेंद्र इससे पहले 1985 के उपचुनाव में जीते थे।
2005 के दोनों चुनावों में जदयू को जीत
2005 में बिहार में दो बार चुनाव हुए थे। इन दोनों ही चुनावों में मधेपुरा सीट से जदयू को जीत मिली थी। पहला चुनाव फरवरी में हुआ था जिसमें जदयू के मनिन्द्र कुमार मंडल ने निर्दलीय उम्मीदवार चंद्रशेखर यादव को 10,710 वोट से हरा दिया था।
दूसरी बार चुनाव अक्तूबर में हुए थे। इस चुनाव में जदयू के मनिंद्र कुमार मंडल ने राजद के डॉ. अशोक कुमार को 7,872 वोट से हरा दिया था।
2010: चंद्रशेखर यादव ने दर्ज की जीत
2010 के बाद इस सीट पर लगातार राजद के चंद्रशेखर यादव को ही जीत मिलती आई है। 2010 में उन्होंने जदयू के डॉ. रामेंद्र कुमार यादव रवि को 11,944 वोट से हरा दिया था। 2015 के उन्होंने भाजपा के विजय कुमार "बिमल" को 37,642 वोट से हरा दिया था। 2020 की बात करें तो उन्होंने जदयू के निखिल मंडल को 16,046 वोट से हरा दिया था।
2010 में चंद्रशेखर पहली बार चुनाव जीते थे। इससे पहले 2005 के चुनाव में वह निर्दलीय हार गए थे। इसके बाद उन्होंने राजद के टिकट पर मधेपुरा से तीन बार जीत दर्ज की। इस दौरान महगठबंधन सरकार के दौरान चंद्रशेखर मंत्री भी रहे। उन्होंने अगस्त 2022 से नीतीश कुमार सरकार में शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य किया। इससे पहले, उन्होंने 2015 से 2017 तक बिहार के आपदा प्रबंधन मंत्री के रूप में कार्य किया।
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