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आजादी का अमृत महोत्सव: उदास रात में टिमटिमाते दीयों के बीच जवाहरलाल नेहरू की जन्मस्थली

मनोज मिश्र
Updated Sun, 10 Oct 2021 06:31 AM IST

सार

आज़ादी के अमृत महोत्सव के समय हम पीछे मुड़कर देखें कि देश को बनाने में जिन्होंने अपना जीवन दे दिया उनकी विरासत को हमने कितना सहेजा है? उनकी स्मृतियों से हम कितनी शक्ति लेते हैं? इस महत्त्वपूर्ण अभियान के तहत अमर उजाला ने अपने प्रतिनिधियों को देशभर में भेजा। पिछली बार आपने सरदार पटेल के जन्म स्थान से रिपोर्ट पढ़ी, इस बार पंडित नेहरू की जन्मस्थली...
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पंडित जवाहर लाल नेहरू - फोटो : Amar Ujala

शहर की गलियों से गुजरते हुए जो कोलाज बनता है, उसमें नेहरू का अक्स कभी फेड इन तो कभी फेड आउट होता रहता है। अब यह शहर नेहरू की स्मृतियों का खंडहर भर है। अपने समृद्ध सांस्कृतिक-राजनीतिक इतिहास के गर्व से दीप्त यह शहर एक बाइस्कोप है। कभी बहला फुसलाकर तो कभी उकसाकर, आपसे पूछता लगता है- जी हां हुजूर, मैं अतीत दिखलाता हूं। बोलिए क्या देखेंगे आप?’

यहां सिविल लाइंस में वह कॉफी हाउस है जहां हिंदी के तमाम शीर्ष साहित्यकारों से लेकर राजनीतिज्ञों तक को ‘बोधिसत्व’ प्राप्त हुआ, तो उससे बमुश्किल दो-ढाई किलोमीटर दूर वह शहीद पार्क जिसमें चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा आज भी उसी निर्भीकता से खड़ी नजर आती है जिस निर्भीकता से उन्होंने शहादत से पहले अंग्रेजों से लोहा लिया था। थोड़ा और आगे बढ़िए तो वह दारागंज है जहां निराला ने कालजयी कृतियां रचीं। इससे सटे संगम में कभी हर 12 वर्ष पर अपना सब कुछ दान देने वाला एक राजा आया करता था।



इस्कॉन वाले स्वामी प्रभुपाद ने वर्षों इसी शहर की गलियों की खाक छानी। लोकनाथ के एक चौराहे  पर दो बाई दो फुट के छोटे से मंदिर की ओर इशारा करते  हुए कोई बतलाएगा-जानते हैं, अपने मुन्ना का पाटी पूजन यहीं हुआ था। उसी के बाद उन्होंने पढ़ना-लिखना शुरू किया।’ इसके पहले कि पूछने कोशिश करें कि कौन मुन्ना, सामने वाला जैसे आपकी अज्ञानता पर तरस खाते हुए कहेगा- मुन्ना मने अपने अमिताभ बच्चन।’

दिग्गजाें को जन्म देने में इस शहर का कोई सानी नहीं। यहां की हर गली इतिहास के किसी न किसी दरीचे में खुलती है। इन्हीं में से एक दरीचे में मिलते हैं नेहरू। नेहरू का व्यक्तित्व जिन तत्वों से मिलकर बना है, उनमें इसी बहुरंगी शहर की मिट्टी की प्रधानता है। नेहरू आजाद भारत का नक्शा बनाने के लिए उन्हीं चटख रंगों का इस्तेमाल करते हैं, जिनसे वह अपने बचपन में वाबस्ता होते रहे।

जीवन के विश्वविद्यालय के शुरुआती सबक नेहरू को किस तरह  इसी शहर से मिले, यह इतिहास की किताबों में विस्तार से दर्ज है, लेकिन आज इस शहर में, इस शहर के लोगों में नेहरू की छाप उतनी गाढ़ी नहीं दिखती। शहर की गलियों से गुजरते हुए जो कोलाज बनता है उसमें नेहरू का अक्स कभी फेड इन तो कभी फेड आउट होता रहता है। अब यह शहर नेहरू की स्मृतियों का खंडहर भर है। और जैसा कि नेहरू के महबूब शायर फिराक गोरखपुरी ने कभी कहा था, ‘कुछ दीये हैं टूटे हुए इन्हीं से काम चलाओ, बड़ी उदास है रात’ तो इसके सिवा कोई विकल्प भी शेष नहीं है!

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पंडित जवाहर लाल नेहरू - फोटो : Amar Ujala
शहर की गलियों से गुजरते हुए जो कोलाज बनता है, उसमें नेहरू का अक्स कभी फेड इन तो कभी फेड आउट होता रहता है। अब यह शहर नेहरू की स्मृतियों का खंडहर भर है। अपने समृद्ध सांस्कृतिक-राजनीतिक इतिहास के गर्व से दीप्त यह शहर एक बाइस्कोप है। कभी बहला फुसलाकर तो कभी उकसाकर, आपसे पूछता लगता है- जी हां हुजूर, मैं अतीत दिखलाता हूं। बोलिए क्या देखेंगे आप?’

यहां सिविल लाइंस में वह कॉफी हाउस है जहां हिंदी के तमाम शीर्ष साहित्यकारों से लेकर राजनीतिज्ञों तक को ‘बोधिसत्व’ प्राप्त हुआ, तो उससे बमुश्किल दो-ढाई किलोमीटर दूर वह शहीद पार्क जिसमें चंद्रशेखर आजाद की प्रतिमा आज भी उसी निर्भीकता से खड़ी नजर आती है जिस निर्भीकता से उन्होंने शहादत से पहले अंग्रेजों से लोहा लिया था। थोड़ा और आगे बढ़िए तो वह दारागंज है जहां निराला ने कालजयी कृतियां रचीं। इससे सटे संगम में कभी हर 12 वर्ष पर अपना सब कुछ दान देने वाला एक राजा आया करता था।

इस्कॉन वाले स्वामी प्रभुपाद ने वर्षों इसी शहर की गलियों की खाक छानी। लोकनाथ के एक चौराहे  पर दो बाई दो फुट के छोटे से मंदिर की ओर इशारा करते  हुए कोई बतलाएगा-जानते हैं, अपने मुन्ना का पाटी पूजन यहीं हुआ था। उसी के बाद उन्होंने पढ़ना-लिखना शुरू किया।’ इसके पहले कि पूछने कोशिश करें कि कौन मुन्ना, सामने वाला जैसे आपकी अज्ञानता पर तरस खाते हुए कहेगा- मुन्ना मने अपने अमिताभ बच्चन।’

दिग्गजाें को जन्म देने में इस शहर का कोई सानी नहीं। यहां की हर गली इतिहास के किसी न किसी दरीचे में खुलती है। इन्हीं में से एक दरीचे में मिलते हैं नेहरू। नेहरू का व्यक्तित्व जिन तत्वों से मिलकर बना है, उनमें इसी बहुरंगी शहर की मिट्टी की प्रधानता है। नेहरू आजाद भारत का नक्शा बनाने के लिए उन्हीं चटख रंगों का इस्तेमाल करते हैं, जिनसे वह अपने बचपन में वाबस्ता होते रहे।

जीवन के विश्वविद्यालय के शुरुआती सबक नेहरू को किस तरह  इसी शहर से मिले, यह इतिहास की किताबों में विस्तार से दर्ज है, लेकिन आज इस शहर में, इस शहर के लोगों में नेहरू की छाप उतनी गाढ़ी नहीं दिखती। शहर की गलियों से गुजरते हुए जो कोलाज बनता है उसमें नेहरू का अक्स कभी फेड इन तो कभी फेड आउट होता रहता है। अब यह शहर नेहरू की स्मृतियों का खंडहर भर है। और जैसा कि नेहरू के महबूब शायर फिराक गोरखपुरी ने कभी कहा था, ‘कुछ दीये हैं टूटे हुए इन्हीं से काम चलाओ, बड़ी उदास है रात’ तो इसके सिवा कोई विकल्प भी शेष नहीं है!

इलाहाबाद संग्रहालय: यहां मुस्कुराते हैं नेहरू के सपने

इलाहाबाद संग्रहालय। - फोटो : prayagraj
नेहरू के सपनों की तामीर और किसी क्षेत्र में हुई या नहीं, प्रयागराज का पुरातात्विक संग्रहालय उनके इतिहास बोध और विरासत के प्रति लगाव की घोषणा करता नजर आता है। इस संग्रहालय की बुनियाद 1863 में पड़ी। 18 साल बाद ही, 1881 में इस पर ताला लग गया। 1923-24 में जब जवाहर लाल नेहरू इलाहाबाद म्यूनिसिपल बोर्ड के चेयरमैन बने तब इस संग्रहालय की खोज खबर ली गई। इसे पुनर्स्थापित  करने में उस वक्त के म्यूनिसिपल बोर्ड के कार्यकारी अधिकारी ब्रज मोहन व्यास ने अहम भूमिका निभाई।

नेहरू ने भी संग्रहालय को व्यक्तिगत संग्रह से भी तमाम वस्तुएं भेंट कीं। इस संग्रहालय में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का अशोक स्तंभ है तो दूसरी शताब्दी ईसापूर्व के भरहुत स्तूप के 58 फलक भी हैं। संग्रहालय में राजस्थानी, पहाड़ी, मुगल और कंपनी शैली के चित्रों के साथ-साथ अनागरिक गोविंद और प्रसिद्ध रूसी चित्रकार निकोलस व स्वेतोस्लाव रोरिक के चित्र भी रखे हैं।

कोई सड़क कमला के घर का पता नहीं देती

कमला नेहरू मार्ग पर लगी महादेवी की प्रतिमा। - फोटो : Amar Ujala
आनंद भवन का ऊपरी तल। यहां नेहरू परिवार से जुड़ी तमाम वस्तुएं प्रदर्शन के लिए शोकेस में रखी हैं-कुर्ते, शेरवानी, किताबें, चीनी मिट्टी के बर्तन, स्टील का टी पॉट, कलम....। इन सबके बीच एक छोटी सी डिबिया भी नजर आती है। नीचे पट्टी पर लिखा है-कमला नेहरू की सिंदूरदानी। इस डिबिया में सिंदूर ऊपर तक भरा हुआ है। महज 36 साल की उम्र में टीबी का शिकार होकर स्विट्जरलैंड के अस्पताल में उन्होंने आंखें मूंद ली थीं।

वह कमला, जो अपने जीवन के तमाम सूनेपन और नासाज तबीयत के बावजूद आजादी की लड़ाई में क्षमता से ज्यादा सक्रिय रहीं, उन्हें आखिर इस शहर ने क्या दिया? उनकी स्मृतियों को सहेजने के लिए कोई प्रयास नहीं किए गए। कहने को कमला नेहरू के नाम पर एक सड़क है। विचित्र बात है कि नाम है कमला नेहरू मार्ग और बीच चौराहे पर मूर्ति लगी है महादेवी वर्मा की। महादेवी के सम्मान में भला किसी को क्या आपत्ति होगी? लेकिन कमला नेहरू को उनका देय न मिलना अखरता है।

फिरोज: सूनी कब्र पर अकेले, अकिंचन

ममफोर्डगंज स्थित पारसी कब्रिस्तान परिसर में फिरोज गांधी की कब्र बदहाल स्थिति में हो गई है। - फोटो : Amar Ujala
12 सितंबर 1912 को मुंबई में एक पारसी इंजीनियर फेरदून जहांगीर गांधी के घर जन्मे उस लड़के के जीवन में सब कुछ जल्दी-जल्दी घटा। आठ बरस का होते-होते पिता की मौत हो गई। मां और दो बहनों के साथ कई सौ मील का सफर करके अपनी मौसी, जो इलाहाबाद के लेडी डफरिन कॉलेज में सर्जन थीं, के घर जाना पड़ा। कॉलेज में पढ़ाई के दौरान लड़का न केवल आजादी की लड़ाई में कूद पड़ा, बल्कि नेहरू परिवार के नजदीक आ गया। फिर परिवार की बेटी से प्रेम, और फिर शादी। रायबरेली से सांसद। ससुर से सियासी मतभेद।

भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा। पत्नी से भी मनमुटाव....और इस तूफानी जीवन के बीच महज 48 साल की उम्र में 8 सितंबर 1960 को हृदयाघात से निधन। इलाहाबाद का पॉश इलाका माने जाने वाले ममफोर्डगंज में पारसियों के कब्रिस्तान में उनकी कब्र पर साफ-सफाई तक नहीं है। फिरोज देश के पहले व्हिसल ब्लोअर हैं। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. पंकज कुमार कहते हैं-यह फिरोज गांधी ही थे, जिनके दबाव में सरकार को बीमा कंपनियों का राष्ट्रीयकरण करना पड़ा और एलआईसी जैसे संस्थान ने आकार लिया। बात दुरुस्त लगती है।
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