माफिया से राजनेता बने अतीक अहमद सहित छह सांसदों को साल 2008 में महज 48 घंटे में देश की विभिन्न जेलों से जुटा कर लोकसभा में वोट डलवाया गया और दांव पर लगी यूपीए सरकार बचाई गई थी। यह वोट विपक्ष द्वारा मनमोहन सरकार के खिलाफ लाए अविश्वास प्रस्ताव के साथ भारत की अमेरिका के साथ परमाणु संधि के लिए भी जरूरी थे। जानकारों के मुताबिक, इन छह सांसदों पर उस वक्त 100 से अधिक मुकदमे दर्ज थे।
जानकार बताते हैं, नागरिक परमाणु डील मुद्दे पर यूपीए सरकार के आगे बढ़ने से नाराज वाम दल सरकार से बाहरी समर्थन वापस ले चुके थे। इसके बाद, लोकसभा में यूपीए के 228 सांसद रह गए थे। साधारण बहुमत के लिए उसे 44 सांसद और चाहिए थे।
तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोकदल और जनता दल सेक्युलर का समर्थन मिला। इनमें फूलपुर से समाजवादी पार्टी से सांसद अतीक अहमद भी था, जिसने निष्ठा के साथ यूपीए के समर्थन में वोट डाला।
18 दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, यूपी पुलिस करेगी आपकी रक्षा
अतीक ने अपनी हत्या से करीब दो हफ्ते पहले ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर यूपी पुलिस की हिरासत में रहते हुए सुरक्षा मांगी थी। 28 मार्च को जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस बेला एम त्रिवेदी ने यह याचिका खारिज कर निर्णय में कहा था, 'चूंकि अतीक न्यायिक अभिरक्षा में है, अगर उसकी जान पर खतरा हुआ तो यूपी की राज्य मशीनरी उसकी सुरक्षा करेगी।' उसे इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष याचिका रखने की छूट दी गई थी।
पूर्व सांसद ने याचिका में कहा था कि यूपी पुलिस की हिरासत में रहते हुए उसकी जान को खतरा है। अतीक के अनुसार उसे व उसके परिवार को उमेश पाल हत्याकांड के आरोपी के तौर पर फर्जी तरीके से घसीटा जा रहा है। उसने यूपी के सीएम योगी द्वारा विधानसभा में दिए बयान 'मिट्टी में मिला देंगे' की हवाला देकर दावा किया था कि उसे अपने व परिजनों के जीवन पर सच में खतरा नजर आ रहा है।
याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'यह कोई ऐसा मामला नहीं, जिसमें वह हस्तक्षेप करे। 2005 में हुई बसपा विधायक राजू पाल की हत्या के अहम गवाह उमेश की भी 24 फरवरी को उनके दो सुरक्षाकर्मियों सहित हत्या कर दी गई थी। शनिवार रात प्रयागराज में पुलिस सुरक्षा में कॉलेज लाए गए अतीक- अशरफ की मीडिया से बात करते समय पत्रकार बनकर आए तीन लोगों ने गोली मार कर हत्या कर दी।