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Stryker Deal: सेना के लिए अमेरिकी स्ट्राइकर लेने पर क्यों अड़ी सरकार? जबकि DRDO का बनाया WHap है उससे बेहतर!

हरेंद्र चौधरी
Updated Tue, 25 Jun 2024 06:02 PM IST

सार

रक्षा मंत्रालय ने स्ट्राइकर की खरीद के लिए तीन चरण की योजना का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत फॉरेन सेल्स रूट (एफएमएस) के जरिए स्ट्राइकर की सीमित ऑफ-द-शेल्फ खरीद के बाद, संयुक्त उत्पादन भारत में होगा। वहीं, इससे भारत में ही स्ट्राइकर जैसे आर्मर्ड व्हीकल्स बनाए जाने लगेंगे।
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भारत-अमेरिका डील। - फोटो : अमर उजाला।


रक्षा मंत्रालय ने स्ट्राइकर की खरीद के लिए तीन चरण की योजना का प्रस्ताव रखा है। इसके तहत फॉरेन सेल्स रूट (एफएमएस) के जरिए स्ट्राइकर की सीमित ऑफ-द-शेल्फ खरीद के बाद, संयुक्त उत्पादन भारत में होगा। वहीं, इससे भारत में ही स्ट्राइकर जैसे आर्मर्ड व्हीकल्स बनाए जाने लगेंगे। वहीं, स्ट्राइकर को पूर्वी लद्दाख और सिक्किम जैसे हाई एल्टीट्यूड इलाकों में चीनी सीमा पर तैनात किया जाएगा। 


पुरानी रूसी BMP को हटाना चाहती है सेना

रक्षा सूत्रों के मुताबिक सेना आने वाले सालों में 2,000 से अधिक पुराने पड़ चुके रूसी मूल के BMP-II वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाना चाहती है। इनकी जगह पर लेटेस्ट जनरेशन इनफ्रैंट्री कॉम्बैट व्हीकल्स की जरूरत है। इसके अलावा सेना को बड़ी संख्या में जल-थल संचालन (एंफीबियस) में इनफ्रैंट्री कॉम्बैट व्हीकल्स की भी आवश्यकता है। जबकि स्ट्राइकर एंफीबियस नहीं है। इसके लिए सेना को स्वदेशी विकल्पों पर विचार करना होगा। स्ट्राइकर के वैरिएंट्स की बात करें, तो इसमें इन्फैंट्री कैरियर व्हीकल, मोबाइल गन सिस्टम, मेडिकल इवेक्वेशन सिस्टम, फायर सपोर्ट (आईसीवी), एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल कैरियर और टोही व्हीकल्स शामिल हैं।




अमेरिकी सेना में काफी पॉपुलर है स्ट्राइकर

स्ट्राइकर को पहली बार 20 साल पहले ऑपरेशन इराकी फ्रीडम II के दौरान इस्तेमाल किया गया था। इसी ऑपरेशन के दौरान 3 ब्रिगेड, सेकंड इन्फैंट्री डिवीजन (अब 1-2 स्ट्राइकर ब्रिगेड कॉम्बैट टीम) को अपना उपनाम 'घोस्ट सोल्जर्स' मिला था। इस आर्म्ड व्हीकल में सवार लोगों को रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड जैसे पारंपरिक हथियारों से सुरक्षित रखने में मदद मिलती थी। सद्दाम की सेना की हार के बाद आईईडी का इस्तेमाल बढ़ गया। ऐसे ही एक आईईडी ब्लास्ट में स्ट्राइकर को काफी नुकसान हुआ, लेकिन चालक दल सुरक्षित बच गया। जिसके बाद अमेरिकी सशस्त्र बलों के बीच यह काफी पॉपुलर हो गई और इसके बारे में यह कहा जाने लगा कि स्ट्राइकर न केवल आपको लड़ाई में ले जा सकता है, बल्कि आपको घर भी सुरक्षित पहुंचा सकता है।


सैन्य सूत्र बताते हैं कि इस साल फरवरी में मौजूदा आर्मी चीफ जनरल मनोज पांडे अमेरिका दौरे पर गए थे। जहां उन्होंने अमेरिकी सेना की वन कोर के हेडक्वॉर्टर का भी दौरा किया था और स्ट्राइकर यूनिट से जानकारी ली थी। भारत और अमेरिका ने 10 नवंबर को टू प्लस टू वार्ता के दौरान 8 पहियों वाले स्ट्राइकर इनफैंट्री कॉम्बैट व्हीकल के संयुक्त निर्माण पर चर्चा की थी। 


WhAP के मुकाबले स्ट्राइकर में कम पावर का इंजन

वहीं सैन्य विशेषज्ञों ने स्ट्राइकर की कम पावर को लेकर चिंता जताई है, क्योंकि इसमें कैटरपिलर सी7 350 हॉर्स पावर इंजन लगा है, और हाई एल्टीट्यूड में इसे ऑपरेट करने में दिक्कत होगी। हालांकि अमेरिका ने स्ट्राइकर को 750 हॉर्स पावर इंजन के साथ अपग्रेड करने की पेशकश की है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इससे मेक इन इंडिया के तहत भारत में बन रहे स्वदेशी WhAP व्हीकल के लिए दिक्कत पैदा होगा। 
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स्ट्राइकर डील से आत्मनिर्भर भारत को होगा नुकसान 

सैन्य विशेषज्ञ और आईएएफ से रिटायर्ड अधिकारी विजेंदर के ठाकुर कहते हैं कि अमेरिकी स्ट्राइकर डील स्वदेशी रूप से विकसित WhAP को खत्म कर देगी। इससे मेक-इन-इंडिया, आत्मनिर्भर भारत अभियान को बेकार हो जाएगा। स्ट्राइकर के स्थानीय निर्माण से रोजगार के अवसर तो पैदा होंगे, लेकिन इससे भारत में WhAP बनाने की घरेलू क्षमता को बढ़ावा नहीं मिलेगा। पिछले दशक में, दो भारतीय कंपनियों- टाटा मोटर्स और महिंद्रा - ने भारतीय सेना के निर्धारित मानकों के अनुसार डीआरडीओ की देखरेख में ऐसे व्हीकल्स बनाने के लिए समझौता किया था। लेकिन अब स्ट्राइकर को खरीदने की जरूरत क्यों पड़ी, इसे समझना मुश्किल है। वह भी उस समय पर जब भारत ने पहले ही स्थानीय स्तर पर WhAP बनाने की क्षमता हासिल कर ली है।  


वहीं एक अन्य रिटायर्ड अधिकारी के. सिंह भी विजेंदर ठाकुर की बात से सहमत हैं। वे कहते हैं कि इससे WhAP की जरूरत केवल एंफीबियस जरूरतों के लिए ही रह जाएगी, और बाकी कामों के लिए केवल स्ट्राइकर ही इ्स्तेमाल किया जाएगा। इसके अलावा फ्यूचर इंफ्रैट्री कॉम्बैट व्हीकल्स का (FICV) का भविष्य भी खतरे में पड़ जाएगा। वहीं, जब इंडिजिनियस डिजाइंड एंड मैन्यूफैक्चर्ड (IDDM) व्हीकल्स मौजूद हैं, तो सरकार स्ट्राइकर की डील को आगे क्यों बढ़ा रही है?


कनाडा को फायदा क्यों पहुंचाना चाहती है सरकार?

डिफेंस एक्सपर्ट और सीनियर जर्नलिस्ट शिव अरूर कहते हैं कि जब टाटा, महिंद्रा, कल्याणी आदि जैसी कंपनियां पहले से ही ICV पर काम कर रही हैं, तो स्ट्राइकर को भारत में अमेरिका के साथ मिलकर बनाना पूरी तरह से मूखर्तापूर्ण है। स्ट्राइकर का पूरा इकोसिस्टम कनाडा में है, तो ऐसे में भारत सरकार को कनाडा को फायदा क्यों पहुंचाना चाहिए। शिव कहते हैं कि यह भारत-अमेरिका डीटीटीआई (डिफेंस टेक्नोलॉजी और ट्रेड इनिशिएटिव) की पूरी तरह से बर्बादी है। 


स्ट्राइकर एक 8-व्हील ड्राइव कॉम्बैट व्हीकल है, जिसे जनरल डायनेमिक्स लैंड सिस्टम्स-कनाडा ने अमेरिका के लिए विकसित किया है। इसमें 350 हॉर्सपावर वाला कैटरपिलर C7 इंजन लगा है, इसकी रेंज 483 किलोमीटर है और यह अधिकतम 100 किमी/घंटा की गति से चल सकता है। इसमें बेहतर सुरक्षा के लिए बोल्ट-ऑन सिरेमिक कवच लगा है और यह इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) का ब्लास्ट भी झेल सकता है।  


हाई एल्टीट्यूड में कामयाब रहा है WhAP 

डिफेंस सेक्टर की दिग्गज कंपनियों टाटा, महिंद्रा और कल्याणी ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के साथ मिलकर व्हील्ड आर्मर्ड प्लेटफॉर्म (WhAP) नामक कॉम्बैट व्हीकल बनाया है। इस प्लेटफॉर्म का शुभारंभ दिल्ली में डिफेंस एक्सपो 2014 में किया गया था। वहीं हाई एल्टीट्यूड जगहों पर भी इसका परीक्षण किया जा चुका है भारतीय सेना इसकी क्षमताओं से प्रभावित हुई थी। 


दिघी में डीआरडीओ प्रयोगशाला में रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टेब्लिशमेंट (इंजीनियर्स) के पूर्व डायरेक्टर डॉ. एस. गुरुप्रसाद के मुताबिक WhAP काफी बेहतरीन है और उच्च तकनीक पर बेस्ड है। इसका परीक्षण हाई एल्टीट्यूड पर भी किया जा चुका है। सेना भी इसके प्रदर्शन से काफी प्रभावित थी। वहीं स्ट्राइकर के विपरीत, WhAP एंफीबियस है। 


WHAP vs Stryker ये हैं खूबियां

WhAP स्ट्राइकर के मुकाबले कई गुना बेहतर है। WhAP 2+9 लोगों को ले जा सकता है, जबकि स्ट्राइकर 3+8 लोगों को ले जा सकता है। WhAP का वजन 21.5 टन है, जबकि स्ट्राइकर का वजन 19.35 टन है। WhAP का पावर-टू-वेट रेशियो 25 है, जबकि स्ट्राइकर का 17.24 है। इसके अलावा WhAP में एंफीबियस क्षमता और परमाणु सेंसर भी हैं, जो स्ट्राइकर में नहीं हैं। इसमें 600 हॉर्सपावर का इंजन लगा है। WhAP 101 किमी प्रति घंटे की अधिकतम गति प्राप्त कर सकता है और इसकी अधिकतम सीमा 500 किमी है। जबकि स्ट्राइकर की अधिकतम रफ्तार 96.5 किमी प्रति घंटा है। वहीं एंफीबियस मोड में WhAP ऑनबोर्ड वॉटर जेट के साथ 10 किमी प्रति घंटे तक की रफ्तार से नदी को पार कर सकता है। इसमें कोंग्सबर्ग 30-मिमी तोप लगी है, जिसे रिमोट से ऑपरेट किया जा सकता है। इसमें 40-मिमी ग्रेनेड लांचर लगे हैं। इसमें एंटी-टैंक मिसाइलें या 12.7 मिमी मशीन गन भी लगाई जा सकती है। 


टाटा पहले ही केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) को इसकी डिलीवरी कर चुकी है। जिनका इस्तेमाल लद्दाख में किया जा रहा है। वहीं इनकी कीमत लगभग 23 करोड़ के आसपास आती है, जबकि स्ट्राइकर की कीमत 45 से 47 करोड़ रुपये के आसपास है। 
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