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अफगानिस्तान में 'दगाबाजी' की कहानी: अमेरिका और तालिबान के बीच अफगान सेना की वजह से पलटी बाजी!

सार

सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं के दूसरे दशक में वहां अफगान सेनाओं का रूझान लड़ाई से कम होने लगा। अमेरिकी पैसे की लूट करने लगे। एक समय ऐसा भी आया, जब अफगान फौज को अमेरिका ‘बाहर वाला’ लगने लगा...
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अफगानिस्तान संकट - फोटो : पीटीआई (फाइल)
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विस्तार
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अफगानिस्तान में तालिबान का कब्जा होने के बाद कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। मौजूदा समय में वहां जो कुछ चल रहा है, उसके लिए अमेरिका को जिम्मेदार बताया जा रहा है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है, दरअसल इस मसले को शतरंज के हिसाब से समझना होगा। तालिबानी शतरंज पर अमेरिका और नाटो देश थे। यहां किसी ने, किसी को दगा तो जरूर दी है। कहीं तो विश्वासघात हुआ है। ज्यादा नहीं, दो माह पहले तक यह कहा जा रहा था कि अफगान आर्मी जीत जाएगी। वह जीत के करीब है। उसके पास सारे हथियार हैं।

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दिल्ली में अफगानिस्तान के राजदूत ने दावा किया था कि हमारे पास चार लाख सैनिक हैं। तालिबान के पास 85 हजार लड़ाके हैं। हम उन्हें काबुल नहीं पहुंचने देंगे। देखते देखते सब पलट गया। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने यह कहकर अपनी बात का वजन बढ़ाया कि उनका मिशन कामयाब रहा है। दूसरी तरफ यह कहा जा रहा है कि अफगान आर्मी इस लड़ाई में हाथ पीछे खींच रही थी। वे लड़ाई को छोड़कर दूसरी बातों जैसे लूटपाट व गलत तरीके से पैसा कमाने में लग गए। एक स्थिति वह भी आई जब अमेरिका को यह अहसास हो गया कि अब उसके सामने दो विकल्प हैं। एक उसे वापस लौट जाना चाहिए और दूसरा, जंग जारी रखनी है तो और सैनिकों को बुलाना होगा।



सुरक्षा मामलों के जानकार कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) कहते हैं, अफगानिस्तान में एकाएक तालिबान का कब्जा नहीं हुआ है। इसके लिए लंबे समय से भूमिका तैयार हो रही थी। अमेरिका समझ चुका था कि यहां अब लंबे समय तक टिके रहने का कोई मतलब नहीं है। यह अलग बात है कि 2000 के दशक में अफगानिस्तान में बिजली की भारी किल्लत थी, अब वहां तकरीबन हर घर में लाइट है। दूसरे कई क्षेत्रों में भी विकास हुआ है। अफगान सेना के बारे में कहा जाता है कि वह आगे नहीं बढ़ना चाह रही थी। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वह मन से टूट चुकी थी। तीन हजार से अधिक नाटो सैनिकों की मौत का असर अमेरिका पर देखने को मिल रहा था। ऐसा नहीं है कि अफगान सैनिक नहीं मरे हैं, उनकी संख्या भी दस हजार से अधिक है। खरबों डॉलर का अमेरिकी कर्ज बढ़ता जा रहा था। आज अमेरिका के पास कहने के लिए एक ही बात है कि उसने ओसामा बिन लादेन को मार दिया। आतंकवादी नेटवर्क 'अलकायदा' को उठने लायक नहीं छोड़ा है।

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दूसरे सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं के दूसरे दशक में वहां अफगान सेनाओं का रूझान लड़ाई से कम होने लगा। ऐसा भी नहीं था कि उन्होंने तालिबान का कहीं साथ दिया हो, लेकिन वे थक गए थे। अमेरिकी पैसे की लूट करने लगे। सेना के बड़े अधिकारी भी कथित तौर से इस धंधे में शामिल बताए जाते हैं। एक समय ऐसा भी आया, जब उन्हें अमेरिका ‘बाहर वाला’ लगने लगा। जो बाइडन भले ही कहते रहे कि 'मिशन पूरा हुआ' है। अमेरिका को ओसामा बिन लादेन मिला। सच्चाई यह थी कि पिछले दो तीन वर्षों में अमेरिका ने अफगान आर्मी को खूब हथियार और वाहन दिए, लेकिन उनका इस्तेमाल ही नहीं किया गया। अब तालिबान के लड़ाके वहां पहुंच गए हैं। अफगान आर्मी के लोग जंग के अलावा सभी दूसरे काम करने लगे थे।  

अफगानिस्तान में सुरक्षा के हालात चिंताजनक बन गए। सरकारी सेना आतंकवाद से लड़ना ही नहीं चाह रही थी। यहीं से अमेरिका ने मिशन समाप्ति की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया। उसे अहसास हो गया था कि उसकी ट्रेनिंग और हथियार, सब खत्म हो गया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है, पिछले 19 साल के दौरान अफगानिस्तान में सैन्य खर्च करीब 825 बिलियन अमेरिकी डॉलर पर पहुंच गया था। अफगान आर्मी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। ट्रेनिंग के लिए जो पैसा मिलता, उसे दूसरे कार्यों पर खर्च किया जाने लगा।

कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) के मुताबिक, यही वो स्थिति थी, जिसने अमेरिका को वहां से निकलने के लिए मजबूर कर दिया था। सच्चाई तो ऐसी भी रही है कि अफगानिस्तान में चार लाख की संख्या वाले सुरक्षा बलों में आधे भी लड़ने की स्थिति में नहीं थे। अफगान सेना के हालात बहुत खराब हो चले थे। वे ट्रेनिंग लेने को तैयार नहीं थे। जो ट्रेनर थे, वे आगे नए जवानों को तैयार नहीं कर रहे थे। लूटपाट और नशा, उनका पेशा बन गया था। सेना के आधुनिकीकरण, वेतन और दूसरी सुविधाओं के लिए जो बजट मिलता था, वह किसी दूसरे मद में खर्च कर दिया जाता था।

ऐसे में अमेरिकी सैनिकों पर दबाव बढ़ता जा रहा था। उन पर मानसिक दबाव भी था कि अगर वे यहां से बिना जीते चले गए तो दुनिया क्या कहेगी। अमेरिका के टॉप सैन्य अधिकारियों ने जब अफगान आर्मी की जांच पड़ताल की तो वे चौकन्ने रह गए। मजबूरन बड़े पैमाने पर सेना में बदलाव करना पड़ा। एक अन्य सुरक्षा विश्लेषक बताते हैं कि अमेरिका ने कई बार यहां पैसा और हथियार तो दे दिए, लेकिन ध्यान नहीं दिया। अगर अफगान आर्मी पर इधर-उधर होने के आरोप लगते हैं तो उसके लिए अमेरिकी नेतृत्व भी कम जिम्मेदार नहीं है।
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