दूसरे सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अफगानिस्तान में अमेरिकी सेनाओं के दूसरे दशक में वहां अफगान सेनाओं का रूझान लड़ाई से कम होने लगा। ऐसा भी नहीं था कि उन्होंने तालिबान का कहीं साथ दिया हो, लेकिन वे थक गए थे। अमेरिकी पैसे की लूट करने लगे। सेना के बड़े अधिकारी भी कथित तौर से इस धंधे में शामिल बताए जाते हैं। एक समय ऐसा भी आया, जब उन्हें अमेरिका ‘बाहर वाला’ लगने लगा। जो बाइडन भले ही कहते रहे कि 'मिशन पूरा हुआ' है। अमेरिका को ओसामा बिन लादेन मिला। सच्चाई यह थी कि पिछले दो तीन वर्षों में अमेरिका ने अफगान आर्मी को खूब हथियार और वाहन दिए, लेकिन उनका इस्तेमाल ही नहीं किया गया। अब तालिबान के लड़ाके वहां पहुंच गए हैं। अफगान आर्मी के लोग जंग के अलावा सभी दूसरे काम करने लगे थे।
अफगानिस्तान में सुरक्षा के हालात चिंताजनक बन गए। सरकारी सेना आतंकवाद से लड़ना ही नहीं चाह रही थी। यहीं से अमेरिका ने मिशन समाप्ति की रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया। उसे अहसास हो गया था कि उसकी ट्रेनिंग और हथियार, सब खत्म हो गया है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की रिपोर्ट बताती है, पिछले 19 साल के दौरान अफगानिस्तान में सैन्य खर्च करीब 825 बिलियन अमेरिकी डॉलर पर पहुंच गया था। अफगान आर्मी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। ट्रेनिंग के लिए जो पैसा मिलता, उसे दूसरे कार्यों पर खर्च किया जाने लगा।
कैप्टन अनिल गौर (रिटायर्ड) के मुताबिक, यही वो स्थिति थी, जिसने अमेरिका को वहां से निकलने के लिए मजबूर कर दिया था। सच्चाई तो ऐसी भी रही है कि अफगानिस्तान में चार लाख की संख्या वाले सुरक्षा बलों में आधे भी लड़ने की स्थिति में नहीं थे। अफगान सेना के हालात बहुत खराब हो चले थे। वे ट्रेनिंग लेने को तैयार नहीं थे। जो ट्रेनर थे, वे आगे नए जवानों को तैयार नहीं कर रहे थे। लूटपाट और नशा, उनका पेशा बन गया था। सेना के आधुनिकीकरण, वेतन और दूसरी सुविधाओं के लिए जो बजट मिलता था, वह किसी दूसरे मद में खर्च कर दिया जाता था।
ऐसे में अमेरिकी सैनिकों पर दबाव बढ़ता जा रहा था। उन पर मानसिक दबाव भी था कि अगर वे यहां से बिना जीते चले गए तो दुनिया क्या कहेगी। अमेरिका के टॉप सैन्य अधिकारियों ने जब अफगान आर्मी की जांच पड़ताल की तो वे चौकन्ने रह गए। मजबूरन बड़े पैमाने पर सेना में बदलाव करना पड़ा। एक अन्य सुरक्षा विश्लेषक बताते हैं कि अमेरिका ने कई बार यहां पैसा और हथियार तो दे दिए, लेकिन ध्यान नहीं दिया। अगर अफगान आर्मी पर इधर-उधर होने के आरोप लगते हैं तो उसके लिए अमेरिकी नेतृत्व भी कम जिम्मेदार नहीं है।