फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

तालिबानी फरेब में फंसी ‘महाशक्ति’: क्या बदनामी के बीच 'आतंकियों' से छीन सकेगा अपने 'फाइटर प्लेन और हथियार'?

सार

अमेरिका ने काबुल हवाई अड्डे पर आतंकी हमले की आशंक जताई है। भले ही हवाई अड्डे पर अमेरिकी सैनिकों का कब्जा है, लेकिन चारों तरफ से तालिबान समर्थक 'आईएस-खुरासान' आतंकी संगठन अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है। आतंकी हमले की जो आशंका जताई गई है, वह इसी संगठन को लेकर है...
विज्ञापन
अफगानिस्तान संकट - फोटो : पीटीआई (फाइल)
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद से ही तालिबान का रोज एक नया चेहरा सामने आ रहा है। अमेरिका और तालिबान के बीच फरवरी 2020, दोहा में हुए अधिकांश समझौतों को 'आतंकियों' ने तोड़ दिया है। दुनिया में इस बात को लेकर अमेरिका की बदनामी हो रही है कि वह अपना सब कुछ अफगानिस्तान में छोड़कर खाली हाथ वापस आ गया। दूसरी तरफ तालिबानी लड़ाके 'अमेरिकी एयरक्रॉफ्ट, बख्तरबंद गाड़ियां और हथियारों' पर कब्जा करने के वीडियो सोशल मीडिया में वायरल कर रहे हैं। अमेरिका के लिए 'भगोड़ा' शब्द इस्तेमाल हो रहा है।

विज्ञापन


सुरक्षा मामलों के जानकार ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) कहते हैं, अब तालिबान 'लादेन' को लेकर सॉफ्ट कॉर्नर दिखा रहा है तो आगे के हालात समझ सकते हैं। अमेरिका को 31 अगस्त का अल्टीमेटम देना, एक शुभ संकेत नहीं है। ऐसे में अमेरिका अब अपने प्लेन, जिनकी संख्या 50 से ज्यादा है, सैंकड़ों बख्तरबंद वाहन, ड्रोन और आधुनिक हथियार वापस लाने की कोशिश कर सकता है। इसमें जोखिम अधिक है और सफलता के चांस कम हैं। अगला सप्ताह बहुत अहम है। सीआईए निदेशक विलियम बर्न्स और तालिबानी नेता अब्दुल गनी बरादर की मुलाकात का नतीजा आना बाकी है।

अमेरिका ने काबुल हवाई अड्डे पर आतंकी हमले की आशंक जताई है। भले ही हवाई अड्डे पर अमेरिकी सैनिकों का कब्जा है, लेकिन चारों तरफ से तालिबान समर्थक 'आईएस-खुरासान' आतंकी संगठन अपनी गतिविधियां बढ़ा रहा है। आतंकी हमले की जो आशंका जताई गई है, वह इसी संगठन को लेकर है। काबुल एयरपोर्ट पर अमेरिका ने खुद के कब्जे वाले गेट 'एब्बे, पूर्वी और उत्तरी' से अपने लोगों को दूर जाने के लिए कह दिया है। लोगों से कहा गया है कि वे किसी सुरक्षित स्थान पर चले जाएं, उन्हें जल्द ही अमेरिका ले जाया जाएगा। इसके साथ ही ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया भी अपने लोगों को एयरपोर्ट से अलग कर रहे हैं। जब से तालिबान ने ओसामा बिन लादेन के मामले में यह बयान दिया है कि अमेरिका के 9/11 हमलों में उसका कोई हाथ नहीं था, इसके पुख्ता सबूत भी नहीं हैं, तभी से अमेरिका और दूसरे राष्ट्र सचेत हो गए हैं।
विज्ञापन


ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता (रिटायर्ड) के अनुसार, तालिबान बड़ी गलतफहमी की तरफ जा रहा है। वह समझता है कि चीन के सहारे अमेरिका को टक्कर दे देगा। अमेरिका को मुकाबले में हरा देगा। आतंक शब्द पर अमेरिका की प्रतिबद्धता नहीं है, लेकिन वह चाहता है दुनिया से ये खत्म हो जाए।

विज्ञापन

9/11 हमलों को अंजाम देने वाले 'लादेन' के मामले में आज तालिबान जो बयानबाजी कर रहा है, वह तथ्यों के साथ खिलवाड़ है। तालिबान, लादेन को सुप्रीम मानता रहा है। उसे तालिबान ने ही शेल्टर दिया था। वह ऐसे प्रयासों में लगा है कि दुनिया यह समझे, अब नए वाला तालिबान बहुत बदल गया है। इसकी पोल भी बहुत जल्द खुल गई। बच्चों एवं बेगुनाह लोगों को मारना और महिलाओं पर प्रतिबंध लगाना, ये पुराने तालिबान की आदतें हैं। अमेरिका जब तक अफगानिस्तान में रहा, 'फ्रीडम फॉर ऑल' का नियम लागू था। अब लोगों की आजादी छीनी जा रही है। पुराना तालिबान भी शरिया कानूनों में विश्वास करता था, आज का तालिबान भी उसकी आड़ में बहुत कुछ गलत कर रहा है। ब्रिगेडियर गुप्ता कहते हैं, दूसरे कई देशों में शरिया कानून हैं। वहां तो तालिबान जैसे प्रतिबंध नहीं हैं। सउदी अरब में महिलाओं को भरपूर आजादी है। वहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं ने अपनी छवि बनाई है। तालिबान अभी चीन के इशारे पर काम कर रहा है।  

ब्रिगेडियर अनिल गुप्ता ने कहा, चीन तो सूदखोरी का काम करता है। वह लोन देता है और वसूल करता है। उससे पैसे ऐंठना आसान नहीं है। अमेरिका से आर्थिक मदद ले सकते हो, लेकिन चीन से नहीं। अगर चीन से मदद ले ली तो उसके बदले वह जितना वसूलेगा, उसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता। आज काबुल एयरपोर्ट पर आतंकी हमले का अलर्ट है। काबुल शहर की सुरक्षा आतंकी संगठन 'हक्कानी नेटवर्क' को दी गई है। अमेरिका को भी अपनी गलती का अहसास हो रहा है। बतौर ब्रिगेडियर गुप्ता, मुझे ऐसा लगता है कि अब अमेरिका अपने 'प्लेन, वाहन और हथियार' जो तालिबान के कब्जे में हैं, उन्हें वापस ले सकता है। सीआईए डायरेक्टर विलियम बर्न्स और अब्दुल गनी बरादर की मुलाकात में तालिबान इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी समूह के सम्भावित हमलों का जिक्र है। एयरफील्ड से अमेरिकी जहाज कैसे वापस लिए जाएं, इस बारे में भी चर्चा हुई है। अमेरिका रेस्क्यू मिशन से जुड़े लोग तालिबान के संपर्क में हैं। किसी भी तरह 31 अगस्त तक अमेरिकी और दूसरे लोग, जिन्होंने अमेरिका का साथ दिया है, वे काबुल एयरपोर्ट पर फंसे हैं, उन्हें वहां से सुरक्षित निकालना है।

अगला सप्ताह बहुत अहम है। पेंटागन अधिकारी इस प्रयास में लगे हैं कि 31 अगस्त तक काबुल से ज्यादा से ज्यादा उड़ान भरें। राष्ट्रपति जो बाइडन ने मंगलवार को कहा था कि छह हजार सैनिकों को अगले पांच दिन में निकाल लेंगे। अभी तक करीब 74 हजार लोगों को वहां से निकाल लिया गया है। सुरक्षा एजेंसियों के लोगों का कहना है कि अमेरिकी सैनिकों को मिलाकर वहां करीब 11 हजार लोग फंसे हैं। लोगों को अफगानिस्तान से निकालने की जो मौजूदा रफ्तार है, 31 अगस्त की डेड लाइन उसके लिए कम पड़ सकती है। सबसे बाद में उन लोगों को बाहर निकाला जाएगा, जिन्होंने अमेरिकी सैनिकों की मदद की है। ऐसे लोगों की संख्या लगभग छह सौ बताई गई है। अफगानिस्तान से बाहर जाने वाले लोगों को देखें तो वह आंकड़ा तीन लाख के आसपास है। अभी 74 हजार लोग ही वहां से निकाले गए हैं। चूंकि तालिबान ने दोहा समझौता तोड़ दिया है, इसलिए लोग भयभीत हैं। तालिबान ने कहा था कि वह लोकतांत्रिक प्रक्रिया और धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करेगा। अब ऐसा नहीं है। तालिबान ने यह शर्त भी लगा दी है कि जो स्थानीय लोग बाहर जाना चाहते हैं, उसके लिए उन्हें तालिबानी प्रशासन से मंजूरी लेनी पड़ेगी।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें