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तालिबान के एजेंडे से अभी दूर है कश्मीर: 'पाकिस्तान' को जवाब देने के लिए मुस्तैद हैं साढ़े चार लाख जवान

सार

रिटायर्ड आईपीएस डॉ. एनसी अस्थाना कहते हैं, अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने के बाद से ही चीन और पाकिस्तान का उसके प्रति खास झुकाव दिख रहा है। चीन ने तालिबान की सरकार को 31 मिलियन डॉलर की आर्थिक मदद देने का एलान कर दिया है। चीन का कहना है, ये शुरुआत है...
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अफगानिस्तान में तालिबानी - फोटो : PTI (File Photo)
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विस्तार
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अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे से लेकर उसकी सरकार बनने तक एक सवाल सभी के जेहन में आ रहा है। देश में सुरक्षा मामलों के जानकार और आम जन-मानस, कश्मीर को लेकर चिंतित हैं। इनकी सोच है कि अब पाकिस्तान, तालिबान के साथ मिलकर कोई हरकत करेगा। पाकिस्तान से अफगानिस्तान गए करीब 10 हजार आतंकी वापस लौट आए हैं। पाकिस्तान समर्थित जैश, हक्कानी, आईएस-खोरासन और लश्कर जैसे आतंकी समूह जम्मू-कश्मीर में घुसपैठ कर सकते हैं, इंटेलिजेंस एजेंसियों के अलर्ट और सुरक्षा जानकार ऐसी संभावना जता रहे हैं।

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रिटायर्ड आईपीएस डॉ. एनसी अस्थाना, जो केरल के डीजीपी और सीआरपीएफ व बीएसएफ में बतौर एडीजी अपनी सेवाएं देने के साथ-साथ 46 किताबें एवं 76 से अधिक रिसर्च पेपर लिख चुके हैं, उनका कहना है, अब ड्रग्स बेचकर 'अफगानिस्तान' नहीं चल सकता। भले ही वहां तालिबान की सरकार है, लेकिन अब वह एक आतंकी समूह नहीं, बल्कि राष्ट्र का प्रतिनिधित्व कर रहा है। मौजूदा परिस्थितियों में तालिबानी सरकार के एजेंडे पर 'कश्मीर' नहीं है। अभी तो उसे रोटी का जुगाड़ करना है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बीच विकास के लिए राजस्व का मार्ग तलाशना है। रही बात पाकिस्तान की तो उसके लिए जम्मू-कश्मीर में पहले से ही साढ़े चार लाख जवान तैनात हैं।

अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्जा होने के बाद से ही चीन और पाकिस्तान का उसके प्रति खास झुकाव दिख रहा है। चीन ने तालिबान की सरकार को 31 मिलियन डॉलर की आर्थिक मदद देने का एलान कर दिया है। चीन का कहना है, ये शुरुआत है। अभी तो तालिबान, अफगानिस्तान में हालात सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़े। इससे पहले चीन यह अपील कर चुका है कि दुनिया को तालिबान के साथ मिलकर काम करना चाहिए। दूसरी तरफ पाकिस्तान को तालिबान ने अपना दूसरा घर बताया है। अफगानिस्तान में पाकिस्तानी सेना, समर्थित आतंकी समूह और आईएसआई चीफ की काबुल में मौजूदगी बहुत कुछ बयां कर रही है।
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पाकिस्तान बार-बार जता रहा है कि हमने तालिबान को सत्ता दिलाने में बहुत मदद की है। इस बाबत खुद पीएम इमरान खान और आर्मी चीफ जनरल बाजवा बयान दे चुके हैं। अब पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी का ताजा बयान सामने आया है। उनका कहना है कि अफगानिस्तान में स्थिर और शांतिपूर्ण माहौल, केवल क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव के माध्यम से संभव है। हम अफगानिस्तान के पड़ोसी हैं, ऐसे में वहां तालिबान की सरकार गठित होने के बाद पाकिस्तान, अफगानिस्तान को छोड़ने का जोखिम नहीं उठा सकता। विदेश मंत्री महमूद कुरैशी ने ये भी बता दिया कि बीस साल के दौरान आतंक के खिलाफ लड़ाई में पाकिस्तान ने अपने 80 हजार लोगों को खो दिया है। अफगानिस्तान की लड़ाई में पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को 150 बिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ है।

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रिटायर्ड आईपीएस डॉ. एनसी अस्थाना - फोटो : Amar Ujala
पूर्व आईपीएस डॉ. एनसी अस्थाना बताते हैं, तालिबान को सही स्थिति तक आने में वक्त लगेगा। तालिबान को अब केवल एक आतंकी संगठन की नजर से न देखें। उन्होंने एक राष्ट्र में सरकार का गठन किया है। तालिबान, खुद इन प्रयासों में लगा है कि उसे जल्द से जल्द वैश्विक मान्यता और आर्थिक मदद मिल जाए। यह बात सही है कि अफगानिस्तान में नशे की पैदावार होती है, लेकिन कोई मुल्क केवल ड्रग्स पर जीवित नहीं रह सकता। वहां की जनता गरीबी और भूखमरी से जूझ रही है। ये लोग उन्हें क्या जवाब देंगे। अभी तक वहां तालिबान जो मर्जी करता आया हो, मगर अब उसे यह साबित करना है कि एक राष्ट्र हेरोइन बेचकर अपना खजाना नहीं भर रहा है। तालिबानी शासकों को बीस साल और उससे पहले की स्थिति अच्छी तरह मालूम है। इन दो दशकों में अमेरिका ने अफगानिस्तान में 2.26 ट्रिलियन की राशि खर्च की है। यूएस एवं सहयोगी देशों के 26235 सैनिकों की जान चली गई या वे घायल हो गए। नाटो के सैनिकों ने लगभग 58600 बम गिराए थे। संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन के अनुसार, अफगानिस्तान में 1,11,000 नागरिक मारे गए या घायल हुए थे। अफगान सेना को भी जान माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा था। हालांकि यह पुष्ट आंकड़ा नहीं है, लेकिन साठ हजार से ज्यादा अफगान सैनिकों के भी मारे जाने की बात कही जा रही है।

तालिबान ने वह सब झेला है, इस लिहाज से अब वह इतनी जल्दी आतंकी समूहों को किसी देश की तरफ रवाना नहीं करेगा। डॉ. एनसी अस्थाना के अनुसार, अभी वैसा खतरा नहीं है। उसमें अभी समय है। पाकिस्तान की नीयत खराब है, ये बात सही है। इस मामले में यह बात याद रखना जरुरी है कि मौजूदा दौर में खुद पाकिस्तान की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। ऐसे में वह आतंकियों पर कितना निवेश कर पाएगा, कहना मुश्किल है। भारत 32 साल से घुसपैठियों का सामना कर रहा है।

कश्मीर में तैनात रहे डॉ. अस्थाना कहते हैं, देश ने वह दौर भी देखा है, जब एक साथ सैंकड़ों और हजारों आतंकी सक्रिय रहते थे। भारतीय सुरक्षा बलों ने उन्हें भी मार गिराया। जो अब इक्का-दुक्का आ रहे हैं, वे भी मारे जा रहे हैं। जम्मू कश्मीर में साढ़े चार लाख जवान तैनात हैं। वे पाकिस्तान की किसी भी हरकत का मुंह तोड़ जवाब दे सकते हैं। बॉर्डर के अधिकांश हिस्सों पर फेंसिंग लगी हैं। तालिबान के कब्जे से पहले ऐसी आशंका जताई गई कि अफगानिस्तान में कत्ले आम जैसा कुछ होगा, लेकिन अभी वैसी नौबत नहीं आई है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और देशों के प्रतिबंधों से निजात पाने में तालिबान को लंबा समय लगेगा। ऐसे में उसका सारा ध्यान अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में लगा रहेगा। अगर तालिबान, अपने लोगों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने में कामयाब नहीं हो पाता है तो वहां पर गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा होने में देर नहीं लगेगी।
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बता दें कि अफगानिस्तान में पर्याप्त खनिज भंडार हैं। अब तालिबान चाहता है कि विदेशी आर्थिक मदद और तकनीक के माध्यम से खनिज निकालने का काम शुरू कराया जाए। अब सहायता कौन से देश देते हैं, यह देखने वाली बात होगी। जर्मनी के विदेश मंत्री ने तालिबान की सरकार गठन होने से पहले कहा था, अगर तालिबान, अफगानिस्तान पर कब्ज कर लेता है व शरिया कानून लागू करता है तो हम एक भी सेंट (मुद्रा) की मदद नहीं देंगे। अभी इस देश में विदेश व्यापार निवेश न के बराबर है। भ्रष्टाचार से निपटना भी तालिबान के लिए एक चुनौती बनी रहेगी। आयात पर प्रतिबंध जारी रहते हैं तो उनका विकल्प भी तलाशना होगा। विश्व बैंक ने अफगानिस्तान के निजी सेक्टर को बेहद संकुचित बताता है।

डॉ. अस्थाना कहते हैं, वहां की आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी खेती पर निर्भर है। दो तिहाई लोग, खेती को ही आय का और पेट भरने का जरिया मानते हैं। पिछले बीस वर्षों में अवैध खनन और ड्रग्स, इन्हें कारोबार के तौर पर लिया गया। यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम्स (यूएनओडीसी) की रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान को अफीम का सबसे बड़ा उत्पादक देश माना जाता है। अगर वैश्विक स्तर पर अफीम के उत्पादन की बात करें तो उसके कुल उत्पादन का 80 फीसदी से अधिक हिस्सा अफगानिस्तान में मौजूद है। तालिबान की आमदनी में 60 फीसदी हिस्सा ड्रग्स कारोबार का रहा है। अब तालिबान की सरकार का गठन होने के बाद अमेरिका का यह बयान, हालांकि यह अंतरिम सरकार है, लेकिन तालिबान का मूल्यांकन उसके कामों से होगा। वह जो कहता आ रहा है, उन शब्दों से नहीं। अफगान, सभी के साथ से बनी सरकार की अपेक्षा रखते हैं, हमारी भी यही उम्मीद है। यूएस ने साथ ही चेताया भी है कि तालिबान, अफगान की सरजमीं का उपयोग किसी देश के खिलाफ नहीं होने दे।
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