रिटायर्ड आईपीएस डॉ. एनसी अस्थाना
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पूर्व आईपीएस डॉ. एनसी अस्थाना बताते हैं, तालिबान को सही स्थिति तक आने में वक्त लगेगा। तालिबान को अब केवल एक आतंकी संगठन की नजर से न देखें। उन्होंने एक राष्ट्र में सरकार का गठन किया है। तालिबान, खुद इन प्रयासों में लगा है कि उसे जल्द से जल्द वैश्विक मान्यता और आर्थिक मदद मिल जाए। यह बात सही है कि अफगानिस्तान में नशे की पैदावार होती है, लेकिन कोई मुल्क केवल ड्रग्स पर जीवित नहीं रह सकता। वहां की जनता गरीबी और भूखमरी से जूझ रही है। ये लोग उन्हें क्या जवाब देंगे। अभी तक वहां तालिबान जो मर्जी करता आया हो, मगर अब उसे यह साबित करना है कि एक राष्ट्र हेरोइन बेचकर अपना खजाना नहीं भर रहा है। तालिबानी शासकों को बीस साल और उससे पहले की स्थिति अच्छी तरह मालूम है। इन दो दशकों में अमेरिका ने अफगानिस्तान में 2.26 ट्रिलियन की राशि खर्च की है। यूएस एवं सहयोगी देशों के 26235 सैनिकों की जान चली गई या वे घायल हो गए। नाटो के सैनिकों ने लगभग 58600 बम गिराए थे। संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन के अनुसार, अफगानिस्तान में 1,11,000 नागरिक मारे गए या घायल हुए थे। अफगान सेना को भी जान माल का भारी नुकसान उठाना पड़ा था। हालांकि यह पुष्ट आंकड़ा नहीं है, लेकिन साठ हजार से ज्यादा अफगान सैनिकों के भी मारे जाने की बात कही जा रही है।
तालिबान ने वह सब झेला है, इस लिहाज से अब वह इतनी जल्दी आतंकी समूहों को किसी देश की तरफ रवाना नहीं करेगा। डॉ. एनसी अस्थाना के अनुसार, अभी वैसा खतरा नहीं है। उसमें अभी समय है। पाकिस्तान की नीयत खराब है, ये बात सही है। इस मामले में यह बात याद रखना जरुरी है कि मौजूदा दौर में खुद पाकिस्तान की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। ऐसे में वह आतंकियों पर कितना निवेश कर पाएगा, कहना मुश्किल है। भारत 32 साल से घुसपैठियों का सामना कर रहा है।
कश्मीर में तैनात रहे डॉ. अस्थाना कहते हैं, देश ने वह दौर भी देखा है, जब एक साथ सैंकड़ों और हजारों आतंकी सक्रिय रहते थे। भारतीय सुरक्षा बलों ने उन्हें भी मार गिराया। जो अब इक्का-दुक्का आ रहे हैं, वे भी मारे जा रहे हैं। जम्मू कश्मीर में साढ़े चार लाख जवान तैनात हैं। वे पाकिस्तान की किसी भी हरकत का मुंह तोड़ जवाब दे सकते हैं। बॉर्डर के अधिकांश हिस्सों पर फेंसिंग लगी हैं। तालिबान के कब्जे से पहले ऐसी आशंका जताई गई कि अफगानिस्तान में कत्ले आम जैसा कुछ होगा, लेकिन अभी वैसी नौबत नहीं आई है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और देशों के प्रतिबंधों से निजात पाने में तालिबान को लंबा समय लगेगा। ऐसे में उसका सारा ध्यान अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में लगा रहेगा। अगर तालिबान, अपने लोगों को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराने में कामयाब नहीं हो पाता है तो वहां पर गृह युद्ध जैसी स्थिति पैदा होने में देर नहीं लगेगी।
बता दें कि अफगानिस्तान में पर्याप्त खनिज भंडार हैं। अब तालिबान चाहता है कि विदेशी आर्थिक मदद और तकनीक के माध्यम से खनिज निकालने का काम शुरू कराया जाए। अब सहायता कौन से देश देते हैं, यह देखने वाली बात होगी। जर्मनी के विदेश मंत्री ने तालिबान की सरकार गठन होने से पहले कहा था, अगर तालिबान, अफगानिस्तान पर कब्ज कर लेता है व शरिया कानून लागू करता है तो हम एक भी सेंट (मुद्रा) की मदद नहीं देंगे। अभी इस देश में विदेश व्यापार निवेश न के बराबर है। भ्रष्टाचार से निपटना भी तालिबान के लिए एक चुनौती बनी रहेगी। आयात पर प्रतिबंध जारी रहते हैं तो उनका विकल्प भी तलाशना होगा। विश्व बैंक ने अफगानिस्तान के निजी सेक्टर को बेहद संकुचित बताता है।
डॉ. अस्थाना कहते हैं, वहां की आबादी का बड़ा हिस्सा आज भी खेती पर निर्भर है। दो तिहाई लोग, खेती को ही आय का और पेट भरने का जरिया मानते हैं। पिछले बीस वर्षों में अवैध खनन और ड्रग्स, इन्हें कारोबार के तौर पर लिया गया। यूनाइटेड नेशंस ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम्स (यूएनओडीसी) की रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान को अफीम का सबसे बड़ा उत्पादक देश माना जाता है। अगर वैश्विक स्तर पर अफीम के उत्पादन की बात करें तो उसके कुल उत्पादन का 80 फीसदी से अधिक हिस्सा अफगानिस्तान में मौजूद है। तालिबान की आमदनी में 60 फीसदी हिस्सा ड्रग्स कारोबार का रहा है। अब तालिबान की सरकार का गठन होने के बाद अमेरिका का यह बयान, हालांकि यह अंतरिम सरकार है, लेकिन तालिबान का मूल्यांकन उसके कामों से होगा। वह जो कहता आ रहा है, उन शब्दों से नहीं। अफगान, सभी के साथ से बनी सरकार की अपेक्षा रखते हैं, हमारी भी यही उम्मीद है। यूएस ने साथ ही चेताया भी है कि तालिबान, अफगान की सरजमीं का उपयोग किसी देश के खिलाफ नहीं होने दे।