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अमेरिका-तालिबान के बीच अफगान शांति वार्ता रद्द होना भारत के लिए राहत की खबर, जानिए कैसे

Mon, 09 Sep 2019 11:54 AM IST
Priyesh Mishra न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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तालिबान - फोटो : सोशल मीडिया
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अमेरिका और तालिबान के बीच अफगान शांति वार्ता रद्द होना भले ही अमेरिका और पाकिस्तान के लिए बुरी खबर हो लेकिन यह भारत के हित में है। इस बातचीत के टूटने से अफगानिस्तान में शांति और कानून व्यवस्था और मजबूत होगी। 

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गौरतलब है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने रविवार को कहा था कि तालिबान और अफगानिस्तान के नेताओं के साथ ‘कैम्प डेविड’ में होने वाली गोपनीय बैठक रद्द कर दी गई है। काबुल में पिछले सप्ताह हुई बमबारी के मद्देनजर यह कदम उठाया गया है।

ट्रम्प ने कहा था कि उन्हें रविवार को ‘कैम्प डेविड’ में दो पक्षों के साथ अलग-अलग वार्ता करनी थी, लेकिन तालिबान के लगातार हिंसात्मक कृत्यों ने उसे विश्वास ना करने योग्य बना दिया।

कश्मीर में तालिबान का इस्तेमाल कर सकता है पाक

तालिबान के साथ अमेरिका की शांति वार्ता पाकिस्तान के लिए एक फायदे का सौदा है। इसलिए इन दोनों ध्रुवों के बीच पाकिस्तानी सरकार और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई मिडिलमैन का काम कर रही है। अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजों के वापस जाते ही पाकिस्तान तालिबान की मदद से कश्मीर में आतंकी घटनाओं को अंजाम दे सकता है।

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तालिबान को अमेरिका के साथ बातचीत की मेज पर पाकिस्तान ही लेकर आया क्योंकि वह अपने पड़ोस से अमेरिकी फौजों की जल्द वापसी चाहता है। कतर की राजधानी दोहा में हो रही अमेरिका-तालिबान वार्ता में शामिल होने के लिए पाकिस्तान ने कुछ महीने पहले ही तालिबान के उप संस्थापक मुल्ला बारादर को जेल से रिहा किया था।

अगर अफगानिस्तान में तालिबान की जड़ें मजबूत होती हैं तो वहां की सरकार को हटाने के लिए पाकिस्तान तालिबान को सैन्य साजो-सामान मुहैया करा सकता है। क्योंकि, अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार के साथ पाकिस्तान के संबंध सही नहीं है।

अफगानिस्तान में चल रही भारत की कई परियोजनाओं को खतरा

तालिबोन - फोटो : social media
भारत पहले ही अफगानिस्तान में अरबों डॉलर के लागत वाले कई मेगा प्रोजेक्ट्स को पूरा कर चुका है और कुछ पर अभी भी काम चल रहा है। भारत ने अब तक अफगानिस्तान को लगभग तीन अरब डॉलर की सहायता दी है जिसके तहत वहाँ संसद भवन, सड़कों और बांध आदि का निर्माण हुआ है। वहां कई मानवीय व विकासशील परियोजनाओं पर भारत अभी भी काम कर रहा है। इस कारण अफगानिस्तान में भारत की लोकप्रियता खूब बढ़ी है।

भारत 116 सामुदायिक विकास परियोजनाओं पर काम कर रहा है जिन्हें अफगानिस्तान के 31 प्रांतों में क्रियान्वित किया जाएगा। इनमें शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, सिंचाई, पेयजल, नवीकरणीय ऊर्जा, खेल अवसंरचना और प्रशासनिक अवसंरचना के क्षेत्र भी शामिल हैं। भारत काबुल के लिये शहतूत बांध और पेयजल परियोजना पर भी काम कर रहा है। 

इसके अलावा अफगान शरणार्थियों के पुनर्वास को प्रोत्साहित करने के लिये नानगरहर प्रांत में कम लागत पर घरों का निर्माण किया जाना प्रस्तावित है। बामयान प्रांत में बंद-ए-अमीर तक सड़क संपर्क, परवान प्रांत में चारिकार शहर के लिये जलापूर्ति नेटवर्क और मजार-ए-शरीफ में पॉलीटेक्नीक के निर्माण में भी भारत सहयोग दे रहा है। कंधार में अफगान राष्ट्रीय कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (ANASTU) की स्थापना के लिये भी भारत सहयोग कर रहा है।

चाबहार परियोजना को खतरा

भारत ने अफगानिस्तान, मध्य एशिया, रूस और यूरोप के देशों से व्यापार और संबंधों को मजबूती देने के लिए ईरान के चाबहार पोर्ट के विकास में भारी निवेश किया है। इससे चीन की वन बेल्ट वन रोड परियोजना के काट के रूप में भी देखा जा रहा है। यदि अफगानिस्तान में तालिबान सत्तासीन होता है तो भारत की यह परियोजना भी खतरे में पड़ सकती है क्योंकि इससे अफगानिस्तान के रास्ते अन्य देशों में भारत की पहुंच बाधित होगी। 

अमेरिकी फौज की वापसी से बंद हो सकती हैं भारतीय परियोजनाएं

यूएस आर्मी - फोटो : US Department of Defense
अमेरिकी सेना का अफगानिस्तान में रहना वहां की सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है। अगर अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से चली जाती है तो वहां तालिबान का कब्जा हो जाने की आशंका है। ऐसे में भारत को अपने द्वारा वित्तपोषित विकास परियोजनाएं रूक सकती हैं।

अफगानिस्तान के साथ संबंधो को और मजबूत बनाने के लिए भारत ने मार्च 2002 में अफगानिस्तान में अपने दूतावास का विस्तार किया और इसके बाद मजार-ए-शरीफ, हेरात, कंधार और जलालाबाद में भी वाणिज्य दूतावास खोले थे। 

अमेरिका-तालिबान शांति वार्ता से गिर सकती है अफगान सरकार

अमेरिका और तालिबान के बीच अगर शांति वार्ता सफल होती तो इससे अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार को खतरा होता। शांति वार्ता के सफल होते ही अमेरिका वहां तैनात अपने सैनिकों को वापस बुला लेता जिससे तालिबान की जड़े अफगानिस्तान में और मजबूत होती। वहां अमेरिका के अलावा तालिबान को रोकने वाला कोई ताकत मौजूद नहीं है।

इतना ही नहीं, अमेरिकी फौजों के वापस जाते ही तालिबान अफगान सरकार के खिलाफ युद्ध का ऐलान भी कर सकता है इससे इस देश में गृहयुद्ध का खतरा पैदा हो जाएगा। तालिबान को पाकिस्तान से परोक्ष रूप से मिल रहा सैन्य समर्थन अफगान सरकार के लिए चिंता का विषय है।

वार्ता के खिलाफ है अफगान सरकार

Ashraf Ghani
अफगानिस्तान भी अमेरिका-तालिबान के बीच वार्ता के खिलाफ है। राष्ट्रपति अशरफ गनी ने एक बयान में कहा था कि बेगुनाह लोगों की हत्या करने वाले समूह से शांति समझौता करना निरर्थक है। क्योंकि तालिबान अफगान सरकार को नहीं मानता। हाल के दिनों में तालिबान ने काबुल में हमलों की संख्या को बढ़ा दिया है।

अफगान सरकार देश में तालिबान के बढ़ते प्रभुत्व से चिंतित है। क्योंकि इससे सरकार के अस्तित्व पर ही संकट पैदा हो सकता है। अफगानिस्तान की नजर में इस वार्ता का सफल होना अमेरिका द्वारा तालिबान की शक्ति को मान्यता देना होगा।  

अमेरिका में बड़ा चुनावी मुद्दा है अफगानिस्तान से सेना की वापसी

चुनावी रैली को संबोधित करते ट्रंप - फोटो : @realDonaldTrump Twitter
अफगानिस्तान में लगभग 20 सालों से चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए अमेरिका एड़ी-चोटी का जोर लगाए हुए है क्योंकि उसे अपने 20 हजार सैनिकों को यहां से निकालकर वापस अपने देश लेकर जाना है। यदि अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद देश में तालिबान का प्रभुत्व बढ़ता है तो इसे अंतरराष्ट्रीय जगत में एक सुपरपावर की हार मानी जाएगी।

दूसरा, अमेरिका में 2020 में राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है। राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले चुनाव प्रचार में दो दशकों से अफगानिस्तान में तैनात अमेरिकी फौज की वापसी को बड़े मुद्दे के रूप में भुनाया था। लेकिन, ट्रंप यह वादा आज तक पूरा नहीं कर सके हैं। 

अब जब अमेरिका राष्ट्रपति चुनाव के मुहाने पर खड़ा है तब ट्रंप के लिए लोगों को यह समझा पाना मुश्किल है कि उन्होंने पिछले चार सालों में अफगानिस्तान से सेना की वापसी क्यों नहीं की।

कौन है तालिबान

तालिबान का उदय 90 के दशक में उत्तरी पाकिस्तान में हुआ जब अफगानिस्तान से सोवियत संघ की सेना वापस जा रही थी। पश्तूनों के नेतृत्व में उभरा तालिबान अफगानिस्तान में 1994 में सामने आया।

माना जाता है कि तालिबान सबसे पहले धार्मिक आयोजनों या मदरसों के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराई जिसमें इस्तेमाल होने वाला ज़्यादातर पैसा सऊदी अरब से आता था। 80 के दशक के अंत में सोवियत संघ के अफगानिस्तान से जाने के बाद वहां कई गुटों में आपसी संघर्ष शुरु हो गया था जिसके बाद तालिबान का जन्म हुआ। उस समय अफगानिस्तान की परिस्थिति ऐसी थी कि स्थानीय लोगों ने तालिबान का स्वागत किया।

शुरुआत में तालिबान की लोकप्रियता इसलिए ज्यादा थी क्योंकि उसने बंदूख की नोक पर देश में फैले भ्रष्टाचार और अव्यवस्था पर अंकुश लगाया। तालिबान ने अपने नियंत्रण में आने वाले इलाकों को सुरक्षित बनाया ताकि लोग स्वतंत्र रूप से व्यवसाय कर सकें।

दक्षिण-पश्चिम अफगानिस्तान से तालिबान ने बहुत तेजी से अपना प्रभाव बढ़ाया। सितंबर 1995 में तालिबान ने ईरान सीमा से लगे अफगानिस्तान के हेरात प्रांत पर कब्ज़ा कर लिया। इसके एक साल बाद तालिबान ने बुरहानुद्दीन रब्बानी सरकार को सत्ता से हटाकर अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया। 1998 आते-आते अफगानिस्तान के लगभग 90 फीसदी इलाकों पर तालिबान का नियंत्रण हो गया था।

पाकिस्तान इस बात से इनकार करता रहा है कि तालिबान के उदय के पीछे उसका ही हाथ रहा है। लेकिन, इस बात में कोई शक नहीं है कि तालिबान के शुरुआती लड़ाकों ने पाकिस्तान के मदरसों में शिक्षा ली।

90 के दशक से लेकर 2001 तक जब तालिबान अफगानिस्तान में सत्ता में था तो केवल तीन देशों ने उसे मान्यता दी थी- पाकिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब। तालिबान के साथ कूटनीतिक संबंध तोड़ने वाला भी पाकिस्तान आखिरी देश था।
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9/11 का बदला लेने के लिए अमेरिका ने किया था अफगानिस्तान पर हमला

न्यूयॉर्क में 11 सितंबर 2001 को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए हमले के बाद अमेरिका समर्थित गठबंधन सेना ने अक्तूबर 2001 में अफगानिस्तान पर हमला कर दिया था। अमेरिका में हुए आतंकी हमले में ओसामा बिन लादेन का संगठन अलकायदा का हाथ था जो अफगानिस्तान से संचालित हो रहा था।

9/11 के कुछ समय बाद ही अमेरिका के नेतृत्व में गठबंधन सेना ने तालिबान को अफगानिस्तान में सत्ता से बेदखल कर दिया हालांकि वह तालिबान के नेता मुल्ला उमर और अल कायदा के बिन लादेन को नहीं पकड़ा जा सका।

हालांकि 2 मई 2011 को पाकिस्तान के एबटाबाद में अमेरिका के नेवी सील कमांडो ने ओसामा बिन लादेन को मार गिराया था। 
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