सरकार ने चहेते उद्योगपतियों की राह आसान की
बतौर श्रीकुमार, केंद्र के इस फैसले के खिलाफ लड़ाई लड़ी जाएगी। यह लड़ाई कोर्ट में और सड़क पर लड़ेंगे। केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस निर्णय को एतिहासिक करार दिया था। उनका कहना था, इन आयुध कारखानों में कार्यरत 76,000 कर्मचारियों की सेवा शर्तों में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। यह निर्णय देश के रक्षा उत्पादन में बढ़ोतरी के मकसद से लिया गया है। इससे देश की रक्षा जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा। सभी सात कंपनियां रक्षा क्षेत्र के अन्य उपक्रमों की तरह ही होंगी। एआईडीईएफ के महासचिव श्रीकुमार बताते हैं, देश की विरासत को प्राइवेट हाथों में सौंप दिया गया है। पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर इस तरह के सौदे के खिलाफ थे। वे आयुध कारखानों के मौजूदा स्वरूप को ही आगे बढ़ाना चाहते थे। इन कारखानों की जमीन दो लाख करोड़ रुपये की है। सरकार अपने चहेते उद्योगपतियों को 62 हजार एकड़ जमीन कोड़ियों के भाव दिलाने के लिए इसकी कीमत 72 हजार करोड़ रुपये लगवा रही थी। अब केंद्र सरकार ने अपने चहेते उद्योगपतियों की राह आसान कर दी है।
बीपीएमएस महासचिव, मुकेश सिंह ने कहा, ये सामान्य कारखाने नहीं हैं। सेना के साजो-सामान की जरुरत कभी ज्यादा हो सकती है तो कभी कम। कभी किसी खास उपकरण की क्षमता बढ़ानी पड़ सकती है। जैसे टैंक हैं, किसी टैंक का वजन जो दशकों पहले ठीक माना जाता था, आज उसे घटाना पड़ रहा है। सामने दुश्मन के पास कैसे टैंक हैं, मैदानी इलाका है पहाड़ी, मौसम कैसा है आदि बातें क्षमता तय करती हैं। ये त्वरित बदलाव सरकारी संस्थान में ही संभव हैं। सुरक्षा की दृष्टि से इन बदलावों को प्राइवेट कंपनी या निगम के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। आज सरकार ने आयुध कारखानों को निगम बना दिया है, लेकिन कल इन्हें बंद भी कर सकती है। सरकार के लिए यह कहना बहुत आसान है कि ये निगम तो घाटे में चल रहे हैं, इसलिए इन्हें बेचना पड़ रहा है। सरकार यह भरोसा दे रही है कि इन निगमों को कंपनी एक्ट में सौ फीसदी लिस्ट कराएंगे। ये सरकार का सफेद झूठ है। पिछले साल ही कर्मियों ने सरकार के समक्ष अपना विरोध दर्ज करा दिया था। इन कारखानों को निगम न बनाने की एवज में डिफेंस सेक्रेटरी को कई तरह के प्रपोजल दिए गए थे, लेकिन सरकार को कोई रास नहीं आया। वजह, केंद्र सरकार इन कारखानों को निजी हाथों में देने का मन बना चुकी थी।