दुलैहड़(ऊना)। हरोली क्षेत्र के नंगल कलां में 0-04-52 हेक्टेयर भूमि पर कब्जे और गैर-मौरूसी काश्तकारी के दावे को लेकर चल रहे विवाद में अतिरिक्त जिला न्यायालय ने अंतरिम राहत देने से इन्कार कर दिया है। अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश-प्रथम ऊना की अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें जमीन पर अस्थायी निषेधाज्ञा लगाने की मांग खारिज कर दी गई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर दावेदार वर्तमान कब्जा प्रथम दृष्टया साबित नहीं कर पाए हैं। उनका आरोप था कि चकबंदी के दौरान उनके पूर्वज के नाम और पिता के नाम में गलत प्रविष्टि की गई तथा बाद में दूसरे पक्ष के पूर्वजों के नाम गैर-मौरूसी के रूप में दर्ज कर दिए गए। दावेदारों ने आशंका जताई थी कि दूसरे पक्ष द्वारा उन्हें जबरन जमीन से बेदखल किया जा सकता है और भूमि का स्वरूप भी बदला जा रहा है। इसी आधार पर उन्होंने मुकदमे के अंतिम निर्णय तक जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने अथवा दूसरे पक्ष को किसी तरह का हस्तक्षेप करने से रोकने की मांग की थी। वहीं, दूसरे पक्ष ने दावेदारों के कब्जे और काश्तकारी के दावे से इन्कार किया। उनका कहना था कि राजस्व रिकॉर्ड में उनके पूर्वजों और बाद में उनके नाम लंबे समय से गैर-मौरूसी के रूप में दर्ज हैं। अदालत ने पाया कि वर्ष 2020-21 की नवीनतम जमाबंदी में भी दूसरे पक्ष के नाम गैर-मौरूसी के रूप में दर्ज हैं। चकबंदी के बाद के राजस्व रिकॉर्ड में भी यही स्थिति बनी हुई है। अदालत ने कहा कि हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम की धारा 45 के तहत राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टियों को सत्यता की वैधानिक धारणा प्राप्त है, जब तक इसके विपरीत साबित न हो जाए या विधि के अनुसार नई प्रविष्टि न हो जाए। वर्ष 1977-78 की पुरानी प्रविष्टि और उसके बाद लगातार चले आ रहे राजस्व रिकॉर्ड के बीच विरोधाभास होने के कारण इस स्तर पर किसी एक पक्ष के कब्जे को निर्णायक रूप से सही नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि चकबंदी के दौरान पूर्वज का नाम गलत दर्ज होने तथा दूसरे पक्ष के नाम गैर-मौरूसी के रूप में कथित तौर पर दर्ज किए जाने के आरोप साक्ष्य का विषय हैं। इनके संबंध में अभी किसी सक्षम राजस्व प्राधिकारी की ओर से प्रविष्टियां रद्द या दुरुस्त किए जाने का आदेश भी रिकॉर्ड पर नहीं है।
अतिरिक्त जिला न्यायालय ने माना कि अंतरिम निषेधाज्ञा के लिए प्रथम दृष्टया मामला, सुविधा का संतुलन और अपूरणीय क्षति तीनों आधारों का होना जरूरी है। दावेदार वर्तमान कब्जा प्रथम दृष्टया साबित नहीं कर पाए, इसलिए अन्य दोनों आधार भी उनके पक्ष में नहीं बनते। इसी आधार पर अपील खारिज कर निचली अदालत का आदेश बरकरार रखा गया। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि इस आदेश को मुख्य मुकदमे के गुण-दोष पर फैसला नहीं माना जाएगा। दोनों पक्षों को साक्ष्य के आधार पर अपना पक्ष साबित करने का अवसर रहेगा। मामले की अगली सुनवाई के लिए 28 सितंबर की तारीख तय की गई है।