कोर्ट ने अन्य गांवों से संबंधित बिक्री विलेखों पर विचार करने से इन्कार कर दिया, क्योंकि याचिकाकर्ताओं के गांव का साक्ष्य उपलब्ध था। दावेदारों ने अदालत को बताया कि सड़क निर्माण के दौरान फलदार और गैर फलदार पेड़ों के उखड़ने का भी मुआवजा दिया जाए। उन्होंने तर्क दिया कि कलेक्टर की ओर से जमीन का मूल्यांकन अलग-अलग तरीके से किया गया था। कलेक्टर के फैसले से असंतुष्ट होने के बाद दावेदारों ने अधिनियम की धारा 18 के तहत रेफरेंस कोर्ट में याचिकाएं दायर कीं। रेफरेंस कोर्ट ने सभी श्रेणियां की जमीन के लिए 1,40,000 प्रति बीघा की दर से बड़ा हुआ मुआवजा देने का आदेश दिया। रेफरेंस कोर्ट की ओर से बनाए गए मुआवजे से भी असंतुष्ट होकर दावेदारों ने मौजूदा फैसले में संशोधित करने और मुआवजा की बढ़ाने की प्रार्थना की थी। अदालत को बताया गया कि रेफरेंस कोर्ट का फैसला कानून और तथ्यों के विरुद्ध है, क्योंकि उसने साक्ष्य का गलत और अनुचित मूल्यांकन किया है।
उन्होंने अदालत से मुआवजा की राशि संशोधित करते हुए इसे 5 लाख प्रति बीघा की अपील की थी। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि धारा 4 की अधिसूचना 15 फरवरी 2000 और आधार माने गए बिक्री विलेख 24 मई 1999 की तारीख के बीच (केवल लगभग नौ महीने का अंतराल) का था। इसलिए इस मामले में कोई संचयी वृद्धि दर देना उचित नहीं था।