उदयपुर (लाहौल-स्पीति)। साइबेरिया के नाम से विख्यात जनजातीय क्षेत्र लाहौल घाटी में कई दुर्लभ प्रजाति के वन्य जीव कड़ाके की ठंड में रिहायशी इलाकों में आने लगे हैं। सर्दी शुरू होते ही साढ़े आठ हजार फीट से अधिक ऊंचाई पर पाए जाने वाले वन्य जीव कई रिहायशी इलाकों के आसपास देखे जा सकते हैं। इन दिनों लाहौल के पहाड़, झरने व नाले जमना शुरू हो गए हैं।
अब वन्य जीव प्यास बुझाने के लिए घाटी के कई क्षेत्रों में रिहायशी इलाकों के आसपास नदी व नालों में देखे जा रहे हैं। ऐसे में लाहौल वन विभाग ने इन वन्यजीवों की सुरक्षा को कमर कस ली है। घाटी में महिलाओं की सख्ती के कारण वन विभाग व पुलिस के पास शिकार का पिछले कई सालों से कोई भी मामला नहीं है। लाहौल वन मंडल के अंतर्गत वन रेंज तिंदी, उदयपुर, पट्टन वन परिक्षेत्र जाहलमा और केलांग ने वन्य जीवों की सुरक्षा और वनों में आगजनी जैसे घटनाओं को लेकर पेट्रोलिंग तेज कर दी है। भले ही यहां वन क्षेत्र कम हो, लेकिन क्षेत्रफल के लिहाज से यह जिला प्रदेश में सबसे बड़ा है। कम वन क्षेत्र के बाद भी यहां के वनों में हिमालयन थार, हिमालयन सीरो, हिमालयन घोरल, कस्तूरी मृग, बर्फानी तेंदुआ, आईबैक्स, भूरा एवं काला भालू सहित कई प्रजाति के वन्य जीव पाए जाते हैं। लाहौल वन मंडलाधिकारी दिनेश शर्मा ने बताया कि वन्य जीवों की सुरक्षा एवं वनों में आगजनी जैसे घटनाओं पर नजर रखने के लिए वन विभाग के कर्मचारी नियमित गश्त पर तैनात कर दिए हैं। उन्होंने लोगों से अपील की है कि वह प्यास बुझाने के लिए निचले क्षेत्रों की ओर आने वाले वन्य जीवों को किसी तरह का नुकसान न पहुंचाए। संवाद