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सूखे से गुच्छी का उत्पादन 80 फीसदी कम

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सूखे से गुच्छी का उत्पादन 80 फीसदी कम
जिले में जंगलों से निराश होकर लौटे रहीं महिलाएं, लाखों रुपये का नुकसान
महेंद्र पालसरा
न्यूली (कुल्लू)। देश-दुनिया में गुच्छी के लिए प्रसिद्ध कुल्लू जिले में डेढ़ माह से सूखे की मार पड़ रही है। इसका असर गुच्छी के उत्पादन पर पड़ रहा है।
जिला सहित सूबे में सूखे जैसे हालत होने से इस बार जंगलों में गुच्छी की पैदावार 80 फीसदी तक कम हुई है। इसका नुकसान जिले के साथ मंडी, किन्नौर व जिला शिमला के हजारों लोगों को हुआ है। गुच्छी के कारोबार में महिलाओं की भूमिका सबसे अधिक रहती है। मार्च और अप्रैल में अधिकतर महिलाएं जंगलों में गुच्छी ढूंढने के लिए निकलती हैं। जिले के निरमंड से लेकर पर्यटन नगरी मनाली की महिलाएं गुच्छी को बेचकर अपनी आर्थिकी को मजबूत करती हैं, लेकिन इस बार महिलाएं जंगलों से निराश होकर घर लौट रही हैं। इससे उन्हें लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि पिछले वर्ष ठीक बारिश होने से लोगों को जंगलों में अच्छी गुच्छी मिली थी और लोकल स्तर पर 10 से 12 हजार रुपये का दाम मिला था। इस साल लोगों को न तो गुच्छी मिल रही और न ही अच्छे दाम। जिले में इन दिनों गुच्छी का सात से आठ हजार रुपये किलो भाव मिल रहा है। बता दें कि सर्दी के बाद पहाड़ों से बर्फ पिघलने के बाद गुच्छी उगनी शुरू हो जाती है। गुच्छी को घरों में सुखाने के लिए रखा जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में गुच्छी की कीमत 20 से 25 हजार रुपये प्रति किलो है। स्थानीय भाषा में गुच्छी को डुंगलू भी कहते हैं। संवाद
पीएम मोदी और बावजेयी भी गुच्छी के मुरीद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी गुच्छी को काफी पसंद किया। गुच्छी को दिल और अन्य रोगों के लिए रामबाण माना गया है। स्थानीय स्तर पर व्यापारी इसे पहाड़ी क्षेत्रों से आठ से 12 हजार रुपये किलो के हिसाब से खरीदते हैं। देश के दिल्ली, चंडीगढ़, मुंबई के बड़े होटलों में गुच्छी को विशेष व्यंजन के तौर पर परोसा जाता है।
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विदेशों में भी होता है निर्यात
हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू कश्मीर से गुच्छी का निर्यात अमेरिका, फ्रांस और इटली में होता है। इन देशों में इसकी अच्छी कीमत है। हिमाचल प्रदेश में गुच्छी कुल्लू, मंडी, कांगड़ा, किन्नौर और सिरमौर के क्षेत्रों में पाई जाती है। शेर सिंह, मोती राम, लगन राणा, हीरा चंद, देवराज, गिरधारी लाल व सोहन लाल ने बताया कि इस बार सूखे के कारण जंगलों में गुच्छी 80 फीसदी तक कम है, जिससे भारी नुकसान हुआ है।
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जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम चक्र में भी बदलाव आ रहा है। गुच्छी के लिए मार्च और अप्रैल माह में बारिश का होना जरूरी है। बारिश न होने से सूखे जैसे हालत बन रहे हैं। इसका असर कृषि व बागवानी पर पड़ रहा है।
-डॉ. आरके सिंह प्रभारी, जीबी पंत, राष्ट्रीय हिमायलन पर्यावरण एवं विकास संस्थान।
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