कुल्लू। देवभूमि में आज भी सदियों पुरानी परंपराएं कायम हैं। 392 साल पुरानी ऐसी ही एक परंपरा कुल्लू जिले में आज भी निभाई जा रही है। यहां वैरागी समुदाय के लोग ब्रज की होली परंपरा को सहेजे हुए हैं। भगवान रघुनाथ के कुल्लू आगमन पर 1630 ई. से लेकर अयोध्या की तर्ज पर होली उत्सव की परंपरा चली आ रही है। जिले में बसंत से ब्रज की होली शुरू हुई है। यह 40 दिन तक मनाई जाएगी। वैरागी समुदाय के लोग टोलियां बनाकर ब्रज भाषा में होली के गीत गा रहे हैं। रघुनाथ मंदिर में भी होली के गीत गाए जा रहे हैं। वैरागी समुदाय की ओर से मनाई जाने वाली इस होली का संबंध नग्गर के झीड़ी और राधा कृष्ण मंदिर नग्गर ठावा से भी है। होलिका दहन के दूसरे दिन भगवान रघुनाथ के मंदिर में कार्यक्रम होगा। इसमें भगवान रघुनाथ को झूला झुलाया जाएगा।
वैरागी समुदाय के संत राम महंत, युद्धवीर दास महंत, कृष्ण महंत, महावीर दास महंत, सरन दास महंत, विनोद महंत, राजकुमार महंत, जगदीश महंत ने बताया कि 392 साल पुरानी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। -संवाद
16वीं सदी के मध्य में कुल्लू आए थे भगवान रघुनाथ
16वीं सदी के मध्य में भगवान रघुनाथ का कुल्लू में आगमन हुआ। उस समय से वैरागी समुदाय के लोग इसको निभा रहे हैं। होलाष्टक में 8 दिन तक संध्या बेला में वैरागी समुदाय होली के गीत गाते हैं। होलिका दहन के दूसरे दिन भगवान रघुनाथ मंदिर में विशेष कार्यक्रम में शामिल होते हैं। इसके साथ होली उत्सव का समापन होता है।
भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह ने कहा कि कुल्लू जिले में होली का उत्सव मथुरा वृंदावन की तर्ज पर 40 दिन तक मनाया जाता है। होलाष्टक में 8 दिन तक भगवान रघुनाथ मंदिर में सायंकाल में गुलाल भी फेंका जाएगा। जिसमें होलिका दहन में फाग में फेरे और फाग की ध्वजा ले जाते हैं। दूसरे दिन भगवान रघुनाथ के साथ होली खेली जाएगी और भगवान अपने गर्भगृह से बाहर आएंगे। इसके बाद भगवान रंग लगाते हैं। जिसके बाद प्रसाद बांटा जाएगा।