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टीएमसी में पेट स्कैन मशीन से छह जिलों के कैंसर रोगियों को मिलेगी सुविधा

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धर्मशाला। सूबे के दूसरे सबसे बड़े सरकारी अस्पताल डॉ. राजेंद्र प्रसाद मेडिकल कॉलेज टांडा में जल्द ही पेट स्कैन की सुविधा शुरू हो जाएगी। प्रदेश सरकार ने आईजीएमसी और टीमएसी में इस सुविधा के लिए इसी हफ्ते सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है।
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टीमएसी में यह पेट को स्कैन करने वाली मशीन लगने से कांगड़ा सहित चंबा, हमीरपुर, ऊना, बिलासपुर और मंडी जिलों के लोगों को सुविधा मिलेगी। वहीं, टांडा मेडिकल कॉलेज प्रशासन ने पेट मशीन को स्थापित करने के लिए तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। इन तैयारियों के पूरा होने के बाद एईआरबी के पास लाइसेंस के लिए आवेदन किया जाएगा। एईआरबी इन तैयारियों से पूरी तरह से संतुष्ट होने के बाद संस्थान को मशीन स्थापित करने के लिए लाइसेंस प्रदान कर देगी। एईआरबी से लाइसेंस और प्रदेश सरकार से बजट मिलने के बाद अस्पताल को पेट स्कैन करने वाली मशीन मिल जाएगी। टांडा मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. भानू अवस्थी ने बताया कि पेट स्कैन मशीन स्थापित करने की तैयारियां तेजी से चल रही हैं।
निजी अस्पतालों से तीन गुना सस्ती होगी पेट की स्कैनिंग
कांगड़ा के एक निजी अस्पताल में पेट स्कैन के लिए करीब 25,000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं। वहीं, सरकारी अस्पताल पीजीआई चंडीगढ़ में यह टेस्ट करीब 8000 रुपये में हो रहा है। इस प्रकार से सरकारी अस्पताल में यह सुविधा मिलने से मरीजों को तीन गुना कम दाम में टेस्ट की सुविधा मिलेगी। वहीं, आईजीएमसी और टीएमसी में इलाज के लिए आने वाले कैंसर रोगियों को पेट स्कैन करवाने के लिए पीजीआई चंडीगढ़ या निजी लैब में जाना पड़ता है। पीजीआई चंडीगढ़ में भले ही यह टेस्ट सस्ता हो जाता है, लेकिन लेकिन पीजीआई में भी पेट स्कैन की एक ही मशीन होने और मरीजों की संख्या ज्यादा होने के कारण मरीजों को अपनी बारी के लिए करीब तीन से चार महीने का इंतजार करना पड़ता है। इसके अलावा निजी अस्पतालों में चंडीगढ़ या दिल्ली आने जाने के लिए अतिरिक्त समय और पैसा खर्च होता है।
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क्या होती है पेट इमेजिंग या स्कैन मशीन
पॉजिट्रॉन एमिशन टोमोग्राफी जिसे पेट इमेजिंग या स्कैन के रूप में भी जाना जाता है, एक प्रकार की चिकित्सा इमेजिंग मशीन होती है, जो कोशिकाओं के स्तर पर परिवर्तनों की पहचान करती है। इससे प्रारंभिक अवस्था में ही बीमारी का निदान करने में मदद मिलती है। पेट स्कैन मशीन से पहले कैंसर मरीजों की जांच एमआरआई और सीटी स्कैन करवाकर ही की जाती थी। इससे यह पता नहीं चलता कि शरीर में किस-किस जगह पर कैंसर है। इसके अलावा न ही यह पता चल पाता है कि यह कितना बढ़ गया है। वहीं, पैट स्कैन से शरीर के छोटे से कैंसर का भी पता चल जाएगा। इसमें मरीज को एक विशेष ग्लूकोज के साथ रेडियो आइसोटोप का इंजेक्शन दिया जाता है। यह दवा सिर्फ कैंसर कोशिकाओं में ही पहुंचती है। इन कोशिकाओं से पॉजिट्रॉन निकलते हैं, जिसे रेडियो एक्टिव आइसोटोप पकड़ लेता है। यही कैंसर ग्रस्त कोशिकाएं होती हैं, जिनकी इमेज पूरी तरह साफ हो जाती है और पता चल जाता है कि कैंसर वाली कोशिकाएं किस अंग से सिग्नल दे रही हैं।
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