नूरपुर (कांगड़ा)। नगर निकाय चुनाव के लिए आरक्षण रोस्टर जारी होते ही जिला कांगड़ा की सबसे पुरानी एवं प्रतिष्ठित नूरपुर नगर परिषद में राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। भले ही इस बार नगर निकाय चुनाव पार्टी चिन्ह पर नहीं हो रहे हों लेकिन राजनीतिक दल अभी से अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों को चुनावी समर में उतारने की रणनीति में जुट गए हैं।
वहीं, पार्षद बनने के इच्छुक उम्मीदवारों ने भी अपने-अपने राजनीतिक आकाओं के चक्कर लगाने शुरू कर दिए हैं। नूरपुर नप के चुनावी इतिहास पर गौर फरमाएं तो यहां हमेशा से ही कांग्रेस का वर्चस्व रहा है। हालांकि, गैर कांग्रेसी के तौर पर एडवोकेट एसके शर्मा को जरूर एक बार अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने का मौका मिला लेकिन नूरपुर नप में भाजपा आज दिन तक अपना खाता नहीं खोल पाई है। जबकि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के करीबी माने जाने वाले पूर्व नप अध्यक्ष एवं वर्तमान में वार्ड चार से पार्षद राकेश महाजन का परिवार पिछले बीस साल से नूरपुर नप पर अपना वर्चस्व बनाए हुए है। 2001 और 2006 में लगातार दो बार नप अध्यक्ष पद कब्जाने वाले राकेश महाजन की धर्मपत्नी कृष्णा महाजन का भी बतौर नप अध्यक्ष यह दूसरा कार्यकाल है।
जोकि पहली बार वर्ष 1995 में नप अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज हुई थीं। नप नूरपुर की मौजूदा दलीय स्थिति की बात करें तो नौ सदस्यीय नूरपुर नगर परिषद में सभी नौ वार्डों में कांग्रेस समर्थित पार्षदों का कब्जा है। जबकि पिछले पंद्रह साल से नप उपाध्यक्ष पद पर कब्जा जमाए यशपाल सोगा नप चुनाव में लगातार छह बार जीत दर्ज चुके हैं। दूसरी तरफ भाजपा ने पिछली बार उपाध्यक्ष पद को छोड़कर अध्यक्ष समेत सभी वार्डों से नए चेहरों को चुनावी दंगल में उतारा था।
जिनमें से सिर्फ वार्ड दो और वार्ड नौ में ही भाजपा प्रत्याशी अपने प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस उम्मीदवारों को टक्कर दे पाए थे। बावजूद इसके कांग्रेस ने एकतरफा मुकाबले में नप के चुनावी इतिहास में पहली बार सभी सीटों पर कब्जा जमाकर रिकार्ड जीत हासिल की थी। जिसके चलते इस बार भाजपा नप चुनाव में कांग्रेस के गढ़ को भेदने के लिए अभी से जमीनी रणनीति बनाने की तैयारी में जुट गई है।
आरक्षण ने बिगाड़ा दिग्गजों का चुनावी गणित
इस मर्तबा आरक्षण रोस्टर के उलटफेर ने कई सियासी दिग्गजों के चुनावी गणित को गड़बड़ा दिया है। वार्ड चार से मौजूदा पार्षद एवं पूर्व नप अध्यक्ष राकेश महाजन को अपना वार्ड महिला प्रत्याशी के लिए आरक्षित होने के बाद अब नई सियासी जमीन तलाशनी पड़ेगी। जबकि वार्ड छह में भी प्रत्याशी चयन को लेेकर कांग्रेस के सामने धर्म संकट खड़ा हो सकता है। पिछली बार उपाध्यक्ष के सीधे चुनाव के चलते वार्ड छह सेे अनिल महाजन को पहली बार पार्षद बनने का मौका मिला था लेकिन इस बार अध्यक्ष व उपाध्यक्ष के चुनाव की पुरानी व्यवस्था ही लागू होने से यशपाल सोगा की वापस अपनी परंपरागत सीट से दावेदारी कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा सकती है।