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दो साल बाद खुले स्कूल

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शहर की एक दुकान पर स्कूल शूज खरीदता बच्चा। - फोटो : Chamba
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चंबा। तीसरी से सातवीं तक के विद्यार्थियों के स्कूलों में पहुंचना अभिभावकों की जेबों पर भारी पड़ रहा है। दो वर्ष से घरों में सहेज की रखी वर्दी, जूते बच्चों के लिए छोटे हो गए हैं।
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स्कूलों में विद्यार्थियों को वेल डेसअप देख बच्चों ने भी अभिभावकों से नई वर्दी और जूतों तक की डिमांड कर दी है। इस कारण अभिभावक बच्चों की डिमांड पूरी करने के लिए बाजार से वर्दी और जूते खरीदने देखे जा सकते हैं। महंगाई की मार से वर्दी और जूतों के दामों में 20 से 40 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। फिलहाल बच्चों को स्कूल भेजने के लिए अभिभावकों को महीने के बजट से अधिक खर्च करना पड़ रहा है।
अभिभावक पुनीत परवाना ने कहा कि दो वर्षों में बच्चों के यूनिफार्म, जूते अब छोटे पड़ गए हैं। बच्चे भी बिना वर्दी और रंग-बिरंगे जूते पहन स्कूल जाने में असहज ही महसूस कर रहे हैं। स्कूलों के खुलने के साथ अब बच्चों की डिमांडनुसार वर्दी खरीदनी पड़ रही है।
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अभिभावक सन्नी ठाकुर ने कहा कि बच्चे नई वर्दी और जूते लेने पर अड़े हैं। कक्षाओं में अन्य बच्चों को देख-देख कर बच्चे भी नई वर्दी और जूतों की मांग कर रहे हैं। दो वर्ष बाद अब स्कूल खुलने से बच्चे खासे उत्साहित हैं।
अभिभावक मीनाक्षी खोसला ने कहा कि स्कूल प्रबंधन को कुछ समय के लिए बिना वर्दी के बच्चों को स्कूल भेजने संबंधी रियायत देनी चाहिए। पहले से ही महंगाई आसमान छू रही है। उस पर स्कूलों में बिना वर्दी के विद्यार्थियों के आने पर रोक अभिभावकों की चिंताएं बढ़ा रही है।
अभिभावक बशीर मोहम्मद ने कहा कि वैश्विक महामारी के बाद अब स्कूलों को खोलने का निर्णय सही है। स्कूलों के खुलने से अभिभावकों पर अब स्कूल का सामान खरीदने से अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। शिक्षा विभाग को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए।
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