तीन नंबर के लिए प्रस्तावित
ग्लोबल प्वाइंट सिस्टम से हो रहा सीमांकन, कई मकान फोरलेन सीमा में आने की आशंका
निशानदेही और खंभों में बड़ा अंतर, प्रभावित परिवारों ने शुरू किया विरोध
प्रभावित परिवार बोले, नक्शों में जीपीएस नंबर दर्ज करना उतना ही जरूरी, जितना बुर्जियों पर दर्ज करना
संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। किरतपुर-नेरचौक फोरलेन निर्माण को लेकर भूमि अधिग्रहण का विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। सड़क के दोनों ओर चौथी बार बुर्जियों की स्थापना और स्थानीय क्षेत्रीय अभिकरण की निशानदेही में भारी अंतर पाए जाने से प्रभावित परिवारों में गहरा रोष है। मौजा भटेड़ तहसील झंडूता के दरम्यानी मेंढ़ों पर सीमांकन को लेकर ग्रामीणों ने विरोध जताते हुए कहा कि यह प्रक्रिया नियमों के विपरीत है और इससे उनकी जमीन मौके पर नहीं मिल पा रही।
ग्रामीणों का कहना है कि बुर्जियां उस समय लगाई जानी चाहिए थीं जब 3ए की अधिसूचना जारी हुई थी, लेकिन उस दौरान नियमों की अनदेखी की गई। अब जबकि लोगों ने मौके पर संरचनाएं खड़ी कर ली हैं, तो नए सीमांकन से उनके मकान और भूमि प्रभावित हो रही है। लोगों ने आरोप लगाया कि अधिसूचना की उल्लंघना का खामियाजा अब उन्हें भुगतना पड़ रहा है। बुर्जियों की इस बार की स्थापना से भले ही कॉमन बाउंड्री, एक्वायर विड्थ, कंट्रोल विड्थ और संभावित अतिक्रमण की पुष्टि हो सके, लेकिन वास्तविकता यह है कि इससे प्रभावित परिवारों को अपनी भूमि मौके पर नहीं मिलेगी। ग्रामीणों का कहना है कि निशानदेही और नए पिलरों में दिन-रात का अंतर देखने को मिल रहा है। ग्रामीणों ने कहा कि अभी नक्शों में जीपीएस नंबर दर्ज करना उतना ही अनिवार्य है जितना बुर्जियों पर दर्ज करना। कहा कि भानुपल्ली से बरमाणा रेल परियोजना के अधिग्रहित क्षेत्र में जीपीएस नंबर मौके पर बनाए गए नक्शों में दर्ज किए गए थे। उसी तरह यहां भी पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। प्रभावितों का कहना है कि मौके पर पहुंचे विभागीय कर्मी तरह-तरह के तर्क देकर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। न तो संबंधित विभाग और न ही स्थानीय लोगों को विश्वास में लिया जा रहा है। इससे ग्रामीणों की चिंता बढ़ गई है।
बताते चलें कि किरतपुर-नेरचौक फोरलेन परियोजना पर चौथी बार बुर्जियां लगाने का काम वन विभाग के आग्रह पर राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने शुरू किया है। लेकिन धराड़सानी से सीमांकन और सड़क के दोनों ओर स्थापित की जा रही बुर्जियों को लेकर विरोध भी शुरू हो गया है। इस सीमांकन के साथ ही कई प्रभावितों की जमीनों और घरों की तरफ एनएचएआई का कब्जा बढ़ रहा है। प्रभावित परिवारों का कहना है कि ग्लोबल प्वाइंट सिस्टम से लगाई जा रही इन बुर्जियों में स्थानीय क्षेत्रीय अभिकरण की ओर से की गई पिछली निशानदेही से भारी अंतर है। इससे कई मकान फोरलेन सीमा में आने की आशंका है और प्रभावित परिवारों पर संकट गहराने लगा है। ग्रामीणों ने कहा कि यह सीमांकन की बुर्जियां वर्ष 2012 में लगाई जानी चाहिए थीं, लेकिन इसे अब किया जा रहा है, जो कि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम 1956 की धारा 3अ की सीधी उल्लंघना है। इस नए सीमांकन से कई मकान फोरलेन की सीमा में आ जाएंगे, जिससे प्रभावित परिवारों को अपनी छत गंवानी पड़ सकती है। क्षेत्रीय अभिकरण द्वारा कई भू-मालिकों को दी गई निशानदेही और अब लगाई जा रही बुर्जियों में बड़ा अंतर पाया जा रहा है। इससे इंतकालों के साथ संलग्न नक्शे भी नए सीमांकन से मेल नहीं खाएंगे और जीपीएस सर्वे के साथ मैच नहीं होंगे। इस संबंध में डीएफओ बिलासपुर राजीव कुमार से बात करने की कोशिश की गई, लेकिन वो फोन पर उपलब्ध नहीं हो सके।