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Bilaspur News: जिप अध्यक्ष पद अनारक्षित, नड्डा के जिले में सियासी प्रतिष्ठा की जंग तेज

Fri, 17 Apr 2026 11:18 PM IST
शिमला ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बिलासपुर
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भाजपा ने बनाई चुनावी कमेटियां, सत्ताधरी कांग्रेस भी चुनाव के लिए सक्रिय
बिलासपुर में क्रॉस वोटिंग और अविश्वास से बदलते रहे समीकरण
पिछली बार जिले में महिला आरक्षित थी जिला परिषद सीट

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। जिला परिषद बिलासपुर के अध्यक्ष पद के अनारक्षित घोषित होते ही जिले में सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं। नए आरक्षण रोस्टर के तहत इस बार यह सीट ओपन हो गई है, जिससे भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी और कड़ी टक्कर के आसार बन गए हैं।
यह जिला भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा का गृह क्षेत्र होने के कारण चुनाव को प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जा रहा है। भाजपा ने पंचायत चुनावों को लेकर तैयारियां तेज करते हुए विभिन्न स्तरों पर कमेटियों का गठन शुरू कर दिया है। इन कमेटियों को चुनावी प्रबंधन और संगठनात्मक समन्वय की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। वहीं, प्रदेश में सत्ता में काबिज कांग्रेस भी इस बार कोई मौका नहीं छोड़ना चाहती। संगठन को सक्रिय करते हुए पार्टी इस सीट पर कब्जा जमाने की रणनीति बना रही है। पिछले कार्यकाल में जिला परिषद पर भाजपा समर्थित चेहरों का दबदबा रहा। वर्ष 2021 में महिला आरक्षित सीट से स्वतंत्र रूप से चुनाव जीतकर आई कुमारी मुस्कान भाजपा के समर्थन से अध्यक्ष बनीं। जुलाई 2023 में अविश्वास प्रस्ताव के बाद उन्हें हटाकर भाजपा समर्थित विमला देवी को अध्यक्ष बनाया गया, जिन्होंने 2026 तक यह जिम्मेदारी संभाली। यदि पिछले वर्षों पर नजर डालें तो जिला परिषद अध्यक्ष पद पर अलग-अलग राजनीतिक दलों का प्रभाव रहा है। वर्ष 2010 में ओपन सीट से भाजपा समर्थित कुलदीप ठाकुर जिप अध्यक्ष रहे। वर्ष 2015 में अनुसूचित जाति (पुरुष) आरक्षित सीट पर अमरजीत बंगा कांग्रेस समर्थित अध्यक्ष बने। वर्ष 2021 में महिला आरक्षित सीट पर भाजपा समर्थित मुस्कान को जिम्मेदारी मिली, जिनके बाद 2023 में विमला देवी अध्यक्ष बनीं।
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पुराने दौर में भी बदले खेल
जिला परिषद की राजनीति पहले भी कई उतार-चढ़ाव देख चुकी है। वर्ष 2005 से 2008 तक संतोष धीमान अध्यक्ष रहीं। उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया, लेकिन कोरम पूरा न होने के कारण मामला अटक गया। इसके बाद करीब 11 महीने तक स्थिति अस्थिर रही।
वर्ष 2009 में अंजना धीमान करीब 9-10 महीने के लिए अध्यक्ष बनीं। उन्होंने उस समय कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार को क्रॉस वोटिंग के जरिए हराया था। उस दौरान प्रदेश में वीरभद्र सिंह की सरकार थी, फिर भी कांग्रेस का पैनल हार गया। उस समय उन्हें स्वतंत्र रूप में देखा गया था। दिलचस्प यह है कि अंजना धीमान वर्तमान में कांग्रेस की जिला अध्यक्ष हैं, जो इस बात का संकेत है कि स्थानीय राजनीति में समीकरण समय के साथ कैसे बदलते रहे हैं।
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अब मुकाबला पूरी तरह खुला
इस बार सीट अनारक्षित होने से चुनावी मुकाबला पूरी तरह खुल गया है। अब सभी वर्गों के उम्मीदवार मैदान में उतर सकते हैं। ऐसे में पंचायत प्रतिनिधियों की निष्ठा, गुटबाजी और व्यक्तिगत पकड़ ही जीत-हार तय करेगी। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा के लिए अपने शीर्ष नेता के गृह जिले में पकड़ बनाए रखना चुनौती है, जबकि कांग्रेस के लिए सत्ता के सहारे यहां बड़ा राजनीतिक संदेश देने का मौका। आने वाले दिनों में संभावित उम्मीदवारों के नाम सामने आने के साथ ही यह सियासी मुकाबला और तेज होने के आसार हैं।
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