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Bilaspur News: घरों के चिराग बुझा रहा चिट्टा, सख्त कानून बेहद जरूरी

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- गांवों तक पहुंच चुका है नेटवर्क, पुलिस या राजनीतिक संरक्षण के बगैर नहीं है संभव
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-हर जिला अस्पताल में नशा मुक्ति केंद्र के रूप में चलाए जाएं 3-4 कमरे
-विधानसभा में चर्चा के दौरान त्रिलोक जमवाल ने की नशे के सौदागरों पर नकेल कसने की बात

संवाद न्यूज एजेंसी
बिलासपुर। सदर के विधायक त्रिलोक जमवाल ने पूरे प्रदेश में विकराल रूप धारण करती जा रही चिट्टे जैसे घातक नशे की समस्या को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए समय रहते कठोर कदम उठाने की वकालत की है। कहा कि यह जानलेवा नशा बच्चों और युवाओं को असमय ही मौत के मुंह में धकेल रहा है। लोगों के घरों के चिराग बुझ रहे हैं।
नशे के बढ़ते प्रचलन को लेकर वीरवार को विधानसभा में चर्चा में भाग लेते हुए त्रिलोक जमवाल ने कहा कि चिंतित करने वाला पहलू यह है कि यह नशा गांवों तक पांव पसार चुका है। नशे का इतना बड़ा नेटवर्क पुलिस या राजनीतिक संरक्षण के बिना संभव नहीं है। इस मामले को गंभीरता से लेकर कड़ी कार्रवाई बेहद जरूरी है। कहा कि चिट्टा नामक यह घातक बीमारी पिछले कुछ सालों से बेहद तेज रफ्तार से बढ़ रही है। नशे की पूर्ति के लिए बच्चे और युवा चोरियां कर रहे हैं। बिलासपुर में तो नशेड़ी शमशानघाट से सरिया तक चुराकर ले गए। नशे के कारण सड़क हादसे भी बढ़ रहे हैं। चिंता इस बात की है कि 18, 20 व 22 साल के युवा और इससे भी कम आयु के बच्चे इस नशे की वजह से दम तोड़ रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार प्रदेश में लगभग दो लाख युवा इस नशे की गिरफ्त में हैं। स्कूली बच्चों को भी यह नशा आसानी से मिल रहा है। लोग चिट्टा बिकने के ठिकाने भी बताते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि पुलिस को इसकी जानकारी क्यों नहीं है। प्रदेश सरकार ने सदन में जवाब दिया है कि 1 जनवरी 2023 से 15 नवंबर 2023 तक चिट्टे से केवल पांच मौतें हुई हैं, लेकिन मरने वालों की इससे अधिक संख्या तो केवल बिलासपुर की है।
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वास्तविक आंकड़ों को छिपाने के बजाए इस बीमारी का कारगर इलाज करना जरूरी है। त्रिलोक जमवाल ने कहा कि नशे के सौदागरों पर नकेल कसने के लिए सख्त कानून बनाए जाने बेहद जरूरी हैं। यदि समय रहते ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले समय में युवा ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे। नशे की चपेट में आ चुके युवाओं को इससे बाहर निकालने के लिए पुख्ता व्यवस्था भी जरूरी है। प्रदेश में गिने-चुने नशा मुक्ति केंद्र ही हैं। निजी नशा मुक्ति केंद्रों में मुंह मांगे पैसे मांगे जाते हैं। कई मां-बाप अपने बच्चों को इन केंद्रों में भेजने का सामर्थ्य नहीं रखते। इससे युवाओं को इस बीमारी से मुक्ति नहीं मिल पाती। अस्पतालों में डॉक्टर के साथ ही अन्य सुविधाएं भी होती हैं। लिहाजा यदि हर जिला अस्पताल के 3-4 कमरे नशा मुक्ति केंद्र बना दिए जाएं तो नशे की गिरफ्त में आ चुके बच्चों और युवाओं के इलाज में आसानी होगी। इसके साथ ही नशे की बुराइयों से बच्चों को अवगत करवाने के लिए इसे स्कूली पाठ्यक्रम में भी शामिल करना चाहिए। इसी तरह पंचायतों की आम सभा के माध्यम से भी समाज को जागरूक किया जा सकता है। समय रहते कारगर कदम नहीं उठाए गए तो बच्चों को अपनी आंखों के सामने मरते देखने की पीड़ा सभी को झेलनी पड़ सकती है।
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