भगेड़ (बिलासपुर)। बिलासपुर जिले के बड़े व्यवसायिक केंद्र घुमारवीं के युवा व्यवसायी पवन बरूर गरीब व जरूरतमंद बेटियों के मददगार बनकर सामने आए हैं। 14 मार्च 2015 को एक दर्दनाक सड़क हादसे में अपनी 20 वर्षीय बेटी नेहा की यादों को जिंदा रखने के लिए अब वह समाज के अन्य लोगों की बेटियों का भविष्य संवार रहे हैं।
इस मुहिम को सार्थक करने के लिए उन्होने 23 मई 2016 को नेहा 15 सदस्यों के सहयोग से नेहा मानव सेवा सोसायटी नाम से एक संस्था का गठन किया। तब से यह संस्था लगातार निस्वार्थ भाव से जरूरतमंद बेटियों की मदद को प्रमुखता से सक्रिय है। समाज के अन्य वर्गों की सेवा और कल्याणकारी कार्यों के लिए भी संस्था के प्रयास लगातार आगे बढ़ रहे हैं। सोसायटी 31 मार्च 2022 तक संस्था लगभग 1.40 करोड़ की धनराशि समाजहित में खर्च कर चुकी है।
नेहा मानव सेवा सोसायटी शिक्षा, स्वास्थ्य, असहाय जन सेवा पर्यावरण व जन कल्याण सेवा के क्षेत्र में विभिन्न परिकल्पों के माध्यम से सैकड़ों लोगों को उनके खाते में सहायता उपलब्ध करवा रही है।
सोसायटी की शिक्षा के क्षेत्र में बाल संरक्षण योजना, मेधावी छात्रवृत्ति योजना, स्कूल किट योजना, लघु पुस्तकालय, स्कूल सुरक्षा एवं जागरूकता प्रोग्राम, स्वास्थ्य के क्षेत्र में रक्तदान अभियान, दिव्यांग सेवाएं, रोगी सेवाएं, अन्नपूर्णा सेवाएं, नशा मुक्ति अभियान, योग जागरूकता अभियान, असहाय जन सेवा के क्षेत्र में तत्काल सहयोग योजना, वृद्धजन सहयोग योजना, विधवा पेंशन योजना आदि आदि कार्यक्रम और गतिविधियां लगातार आगे बढ़ रहीं हैं।
पर्यावरण के क्षेत्र में वृक्षरोपण अभियान, मुक्तिधाम सेवाएं, गोसेवा अभियान व जन कल्याण सेवा के क्षेत्र में प्रोत्साहन एवं सम्मान अभियान, स्वावलंबन योजना, यूथ फोरम, कन्या शादी शगुन योजना आदि शामिल हैं।
संस्था के सदस्य भी देते हैं योगदान
- वर्तमान में सोसाइटी के लगभग 1,000 सदस्य हैं। सभी सदस्य सौ से लेकर एक हजार रुपये का मासिक योगदान जन कल्याण के कार्यों के लिए देते हैं। तीन संरक्षक सदस्य भी हैं, जो 1500 रुपये मासिक देते हैं। हर महीने डेढ़ लाख रुपये से अधिक नियमित तौर पर सहयोग के रूप में संस्था को प्राप्त हो रहे हैं।
इसी साल होगा द्विवार्षिक सम्मेलन
- संस्था का द्वितीय वार्षिक सम्मेलन इसी साल नवंबर में होगा। 2020 व 2021 में कोरोना की वजह से सम्मेलन नहीं हो पाया था। पवन बरूर एक बेटी को खोने के बाद जरूरतमंद बेटियों के साथ पिता धर्म निभाते हुए उनकी पढ़ाई और शादी का खर्च भी उठा रहे हैं। बच्चों को खोने के बाद माता-पिता अकसर टूट जाते हैं, लेकिन पवन बरूर ने अन्य बेटियों का सहारा बनकर नई मिसाल पेश की है। संवाद