मॉडल टाउन में 22 जुलाई 1964 में जन्में नवीन कुमार मेहता ने भारतीय सेना में कार्यरत अपने पिता अमरनाथ मेहता की प्रेरणा से देश की सेवा की राह चुनी। मुकंद लाल पब्लिक स्कूल से दसवीं की पढ़ाई पूरी कर 1982 में 18 की उम्र में ही नवीन भारतीय सेना में हवलदार के पद पर नियुक्त हुए। सेना में 17 साल की सेवा के बाद 1999 में हुए कारगिल युद्ध में हिस्सा लिया। 22 मई 1999 को इस वीर ने दुश्मनों के साथ लड़ते हुए शहादत पाई। शहीद नवीन मेहता की पत्नी डोली मेहता ने बताया कि जब उनके पति कारगिल युद्ध में शहीद हुए तब बेड़ी बेटी चीना छह वर्ष और छोटा बेटा राघव तीन वर्ष का था। उस समय तो सरकार और प्रशासन ने उनके पति को याद किया और परिवार की सुध ली, लेकिन कुछ समय बाद ही उन्हें अनदेखा किया जाने लगा। सरकार द्वारा शहीदों के परिवारों को पेट्रोल पंप और गैस एजेंसी देने की योजना के तहत उन्होंने दो बार अप्लाई किया, लेकिन उसके जवाब में उन्हें कुछ भी नहीं मिला।
डोली मेहता का कहना है कि भले ही सरकार और प्रशासन द्वारा कम से कम शहीदों की कुर्बानी को नहीं भुलाया जाना चाहिए और हर साल विजय दिवस के मौके पर जिला स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कर उन्हें श्रद्धांजलि देनी चाहिए।
बेटे को शहीद का दर्जा दिलवाने के लिए पिता लड़ रहा कानूनी जंग
-पहले सेना ने शहीद माना, फिर सुसाइड केस करार दिया-
यमुनानगर। कारगिल युद्ध के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए परमिंद्र सिंह को शहीद का दर्जा दिलवाने के लिए परिजनों को कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ रही है। सेना ने पहले उसे शहीद का दर्जा दिया था, लेकिन बाद में सुसाइड केस बताया। हालांकि प्रदेश सरकार और गांव के लोग परमिंद्र सिंह को शहीद की तरह सम्मान देते रहे हैं।
तेजली गांव निवासी सहीराम का बेटा राइफलमैन परमिंद्र सिंह राजपुताना रेजीमेंट में था। कारगिल युद्ध के दौरान वह कुपवाड़ा में तैनात था। दस जुलाई 1999 को परमिंद्र के परिजनों को सेना की ओर से तार भेजा गया, जिसमें परमिंद्र के लड़ाई के दौरान शहीद होने की बात कही गई थी। राजपुताना रेजीमेंट के अधिकारी और जवान परमिंद्र का पार्थिव शरीर लेकर गांव आए और उसका पूरे सम्मान के साथ संस्कार किया गया। उस समय हरियाणा के इस शहीद को प्रदेश सरकार की ओर से 10 लाख रुपये दिए गए और तेजली गांव की सड़क और स्कूल का नाम शहीद के नाम रखा गया। करीब दो महीने बाद सेना की ओर से परमिंद्र के परिजनों को रिपोर्ट भेजी गई, जिसमें परमिंद्र सिंह द्वारा सुसाइड करने की बात कही थी। लेकिन परिजन इससे सहमत नहीं हुए। पिता सहीराम का कहना है कि परमिंद्र के शरीर पर सीने और सिर पर गोली लगी थी। उसने सुसाइड नहीं किया है। लेकिन सेना के अधिकारी अपनी बात पर अड़े रहे। बेटे को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए सहीराम ने वर्ष 2000 में हाईकोर्ट में केस दायर किया, जो कि आज तक चल रहा है।