संवाद न्यूज एजेंसी
यमुनानगर। एसएस जैन सभा मॉडल टाउन के प्रांगण में चल रहे चातुर्मास कार्यक्रम के 29वें दिन संक्रांति का उत्सव मनाया। साध्वी कल्पज्ञा महाराज और साध्वी डॉ. स्वाति महाराज ने संगत को प्रवचन दिए। साध्वी डॉ. स्वाति महाराज कहा कि संक्रांति पर दान का विशेष महत्व है। दान को सभी धर्म में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
उन्होंने बताया कि गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने तीन प्रकार के दान का वर्णन किया है। इसमें प्रथम में सात्विक दान है, जो दान करुणा व निस्वार्थ भाव से दिया जाता है। दूसरा है राजसिक दान, जो प्रतिफल की आकांक्षा से दिया जाता है। तीसरा है तामसिक दान, जो प्रसिद्धि के लिए व प्रशंसा पाने के लिए दिया जाता है। इन सभी में जो करुणा भाव से प्रेरित होकर दिया जाता है, वह दान ही सर्वश्रेष्ठ दान है।
जैन धर्म में भी दान का विशेष महत्व है। जैन धर्म के 24 तीर्थंकर भगवानों ने दीक्षा लेने से पूर्व एक वर्ष तक दान दिया था। हमें भी दान करना चाहिए। उन्होंने संक्रांति का महत्व बताया। कहा कि संक्रांति का अर्थ है संचार या प्रवेश। जैन धर्म में संक्रांति का महत्व है, क्योंकि यह आत्मा की यात्रा को दर्शाता है। आत्मा एक जन्म से दूसरे जन्म में प्रवेश करती है।
जैन धर्म में माना जाता है कि आत्मा की यात्रा अनंत है। यह एक जन्म से दूसरे जन्म में प्रवेश करती है। संक्रांति के द्वारा आत्मा एक नए शरीर में प्रवेश करती है और एक नए जीवन की शुरुआत करती है। इस प्रकार संक्रांति जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो आत्मा की यात्रा और विकास को दर्शाती है। साध्वी रतनकल्पा महाराज ने भी विचार रखे।