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माता-पिता का अनमोल त्याग: ब्रेन डेड बेटे के अंगों से 6 लोगों को मिली जिंदगी की नई उम्मीद, एयरलिफ्ट किए ऑर्गन

Sun, 26 Apr 2026 07:34 PM IST
शाहिल शर्मा संवाद न्यूज एजेंसी, रोहतक

सार

डॉ. एच के अग्रवाल ने कहा यह केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि संवेदनाओं, त्याग और उम्मीद का अद्भुत संगम था।
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एयरलिफ्ट किए गए अंग - फोटो : संवाद
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विस्तार
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हरियाणा की धरती पर रविवार का दिन इतिहास में दर्ज हो गया, जब एक 16 वर्षीय किशोर के परिवार ने अपने गहरे दुख को मानवता की सबसे बड़ी मिसाल में बदल दिया। ब्रेन डेड घोषित होने के बाद इस किशोर के अंगदान किए गए, और पहली बार राज्य में अंगों को एयरलिफ्ट कर दूसरे अस्पताल तक पहुंचाया गया। यह कहना है पंडित भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एच के अग्रवाल का। वह रविवार को ट्रामा सेंटर में अंगदान करने वाले परिवार को सांत्वना देने पहुंचे थे।
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ट्रामा सेंटर में भर्ती था किशोर
डॉ. एच के अग्रवाल ने कहा यह केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि संवेदनाओं, त्याग और उम्मीद का अद्भुत संगम था। पीजीआई रोहतक के ट्रामा सेंटर में भर्ती इस किशोर के जीवन की डोर जब टूट गई, तब उसके परिजनों ने ऐसा निर्णय लिया जो किसी भी साधारण इंसान के लिए बेहद कठिन होता है। अपने बेटे को खोने के असीम दुख के बीच उन्होंने दूसरों की जिंदगी बचाने का रास्ता चुना। यही वह क्षण था जब दर्द ने सेवा का रूप ले लिया और एक परिवार का साहस कई परिवारों की उम्मीद बन गया
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कुलपति डॉ. एच. के अग्रवाल ने इस पूरे घटनाक्रम को भावुक शब्दों में साझा करते हुए कहा कि यह हरियाणा के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। उन्होंने बताया कि युवा का लिवर इंस्टीट्यूट ऑफ लीवर और बिलियरी साइंसेज नई दिल्ली भेजा गया, जहां उससे दो मरीजों को नई जिंदगी मिलेगी। इसके अलावा एक किडनी पीजीआई रोहतक में ही एक जरूरतमंद मरीज को दी गई, जबकि दूसरी किडनी आर्मी के कमांड हॉस्पिटल चंडीमंदिर को भेजी गई।

डॉ. अग्रवाल ने कहा कि इस प्रक्रिया का सबसे विशेष और प्रेरणादायक पहलू यह रहा कि चंडीमंदिर स्थित आर्मी कमांड अस्पताल से डॉक्टरों की टीम हेलीकॉप्टर से बाबा मस्तनाथ हेलिपैड पहुंची। वहां से अंग को एयरलिफ्ट कर तुरंत कमांड अस्पताल लाया गया। डॉ. एच के अग्रवाल ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया ने यह साबित कर दिया कि यदि इच्छाशक्ति और समन्वय हो, तो चिकित्सा क्षेत्र में चमत्कार संभव हैं।

डॉ. अग्रवाल ने बताया कि दोनों कॉर्निया भी पीजीआई रोहतक को आवंटित किए गए, जिससे दो नेत्रहीन व्यक्तियों को दृष्टि मिलने की संभावना बनी। इस प्रकार एक 16 वर्षीय किशरो ने अपने जाने के बाद भी 6 घरों में रोशनी और खुशियां भर दीं। यह केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उन परिवारों की कहानी है जो अब फिर से जीवन को मुस्कान के साथ जी सकेंगे।


 
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