ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व कर रजत पदक दिलाने वाले सोनीपत के गांव नाहरी के लाडले पहलवान रवि दहिया ने कहा कि उनका ओलंपिक पदक पिता राकेश दहिया की कड़ी तपस्या का फल है। उसने पदक पाने के लिए कड़ी मेहनत की है लेकिन पिता की मेहनत के आगे वह कुछ नहीं है। वह रजत पदक जीतने से संतुष्ट नहीं हैं। बेशक वह टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण नहीं जीत सके लेकिन पेरिस में होने वाले ओलंपिक-2024 में वह कमी को दूर कर स्वर्ण जरूर जीतेंगे। उन्होंने स्वर्ण न जीत पाने पर मलाल जताया।
सोशल मीडिया से पूरी तरह बनाई दूरी
रवि दहिया ने कहा कि ओलंपिक का पदक पाने के लिए कड़ी मेहनत की है। सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाई और सिर्फ खेल पर ही ध्यान लगाकर दिनरात यही सोचता था कि देश के लिए सोना किस तरह जीता जाएगा। इसके लिए मैंने अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की कुश्ती का बारीकी से अध्ययन किया। देश के लिए रजत जीतकर खुशी मिली है लेकिन स्वर्ण की कसक को भी अगले ओलंपिक में पूरा कर लूंगा। रवि ने कहा कि आज वह एक नए मुकाम पर पहुंच चुके हैं लेकिन यहां तक पहुंचने की सीढ़ी उनके पिता राकेश दहिया ने बनाई है। उनकी बदौलत ही मुझे पहचान मिली है।
देशवासियों का जताया आभार, कहा-फेडरेशन का मिला पूरा सहयोग
रवि दहिया ने कहा कि वह सोना नहीं जीत सके। वह रजत से संतुष्ट नहीं है। रजत पदक हम पहले भी जीत चुके हैं, ऐसे में वह सोना जीतने आए थे। फेडरेशन से हमें पूरा सहयोग मिला। प्रधान बृजमोहन शरण स्वयं यहां उनका मुकाबला देखने आए थे। उन्होंने स्वर्ण पदक जीतने को कहा था।
मैंने अपना 100 फीसदी प्रयास किया लेकिन कुछ कमी रह गई, उसके लिए मैं माफी मांगता हूं। मैं आगे कमी दूर कर देश का नाम रोशन करूंगा। साथ ही मेरे प्रशिक्षक जगमेंद्र सिंह व अनिल मान ने बहुत सहयोग दिया है। फेडरेशन व प्रशिक्षकों ने पूरा साथ दिया। मैं सभी का आभार जताता हूं।
फाइनल में आक्रामकता नहीं दोहरा पाए रवि, रूस के पहलवान ने मेडिकल टाइम लेकर थकान मिटाई
कुश्ती विशेषज्ञ मानते हैं कि रवि ने बेहतर खेल तो दिखाया लेकिन वह सेमीफाइनल मुकाबले की तरफ आक्रामकता नहीं दिखा सके। रूस के पहलवान ने तकनीक का फायदा उठाकर मेडिकल टाइम लिया और अपनी थकान मिटाकर फिर मैदान में उतरा, जिससे उसे जीत मिल गई।