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किसान आंदोलन : कुंडली बॉर्डर पर शुरू हुआ दो दिवसीय अखिल भारतीय अधिवेशन

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कुंडली बॉर्डर पर आयोजित किसान अधिवेशन में मंच पर उपस्थित किसान नेता। संवाद - फोटो : Sonipat
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कुंडली बॉर्डर पर संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले तीनों कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे धरने के नौ महीने पूरे होने पर दो दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन शुरू किया गया। सम्मेलन में देशभर से पहुंचे 2500 से अधिक प्रतिनिधियों ने केंद्र सरकार की किसान व मजदूर विरोधी नीतियों का विरोध जारी रखने का फैसला लिया है।
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इस दौरान भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए कहा कि आंदोलन को तेज करने के लिए इस मंच के माध्यम से संयुक्त किसान मोर्चा कई अहम निर्णय लेगा। साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार को चेताया कि तीनों कानून वापसी से कम कुछ भी स्वीकार नहीं होगा।
कुंडली बॉर्डर पर वीरवार को शुरू हुए संयुक्त किसान मोर्चा के दो दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन के पहले दिन किसान आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। सम्मेलन का उद्घाटन करने के बाद भाकियू के नेता राकेश टिकैत ने कहा कि नौ माह के लंबे अंतराल से किसान सरकार के दर पर बैठे हैं, मगर उनको किसानों की कोई फिक्र नहीं है। अब किसान सम्मेलन में विस्तार से चर्चा करेंगे कि इस आंदोलन में उन्होंने क्या खो दिया और क्या मिला है। उन्होंने कहा कि सरकार तीनों कृषि कानूनों को वापस ले और एमएसपी पर लिखित गारंटी दे। आगे के लिए एक कमेटी बने, जिसमें सरकार के अलावा संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं को भी शामिल किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी नौबत न आने पाए। साथ ही उन्होंने कहा कि आंदोलन का मकसद किसान और किसानी को बचाने के अलावा देश को भी बचाना है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे मुफ्त के डाटा के चक्कर से बाहर निकलकर देशहित में अपना योगदान दें। किसान नेता ने कहा कि इस किसान सम्मेलन में जो भी तय किया जाएगा, पूरे देश में उसी पर काम किया जाएगा। देश को निजीकरण से बचाना होगा। सभी को मिलकर लड़ाई लड़नी होगी।
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वहीं संयुक्त किसान मोर्चा के वरिष्ठ सदस्य जोगेंद्र सिंह उगराहां ने कहा कि यह लड़ाई किसी एक जत्थेबंदी की नहीं है और न ही किसी एक धर्म और जाति की है, बल्कि हर मेहनतकश की है। इस लड़ाई में किसान विरोधी सरकार और कारपोरेट घरानों को टारगेट बनाया गया है। यह अपनी तरह का पहला आंदोलन है, जिसकी चर्चा पूरा विश्व कर रहा है। उन्होंने कहा कि जिस दिन आप हिंसक हो गए, उस दिन समझ लेना हम आंदोलन हार गए। शांतिपूर्वक आंदोलन में ही हमारी जीत है और पूरा विश्वास है कि हम तीनों कानूनों को वापस कराने में कामयाब होंगे। सम्मेलन में बलबीर सिंह राजेवाल, डॉ दर्शन पाल, हन्नान मोल्ला, जगजीत सिंह डल्लेवाल, शिवकुमार शर्मा कक्का, युद्धवीर सिंह व योगेंद्र यादव समेत सभी 40 जत्थेबंदियों के नेता भी शामिल रहे।
गुरनाम सिंह चढूनी ने फिर दिखाए तेवर
सम्मेलन में पहुंचे भाकियू (चढूनी) के राष्ट्रीय अध्यक्ष गुरनाम सिंह चढूनी ने कहा कि किसान आंदोलन में करीब 650 किसान शहीद हो चुके हैं। हरियाणा में 37,650 किसानों पर मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। हमारी माता और बहनों को लाठियां झेलनी पड़ीं। यह आंदोलन किसानों का ही नहीं, बल्कि आम जनता का भी है। मगर अब समय आ गया है कि हमें यहां पर बैठे रहने की बजाय ठोस कदम उठाने होंगे। हम यहां पर बैठकर 2024 तक सरकार का विरोध कर उसे सत्ता से बाहर कर भी दें तो क्या गारंटी है कि अगली सरकार किसानों की मांगों को स्वीकार करेगी। उन्होंने मंच से कहा कि अगर हम एक बार एलान कर दें कि दिल्ली जाना है तो यहां पर लाखों की संख्या में किसान एकत्रित हो जाएंगे। उन्होंने कहा कि मेरा विचार है कि उसके बाद दिल्ली पहुंचकर सरकार को घेरकर उस पर दबाव बनाकर हम अपनी मांगें मनवा सकते हैं। उन्होंने कहा कि वह संयुक्त किसान मोर्चा के साथ हैं, लेकिन मेरी विचारधारा थोड़ी अलग है। जिस तरह से मिशन यूपी व उत्तराखंड चलाया जा रहा है, उसी तरह अपने प्रतिनिधियों को चुनाव में उतारकर अपनी सरकार बनानी चाहिए। सभी सरकारों ने आम आदमी के लिए नीति नहीं बनाई है। सरकार दरवाजे खोलने की बात कहती है, लेकिन कोई बुलावा नहीं दे रहा है। सरकार जनता के लिए होती है, लेकिन यहां उलटा हो रहा है। साथ ही उन्होंने कहा कि पांच सितंबर को मुजफ्फरनगर में रैली की जाएगी। वहीं 25 सितंबर को भारत बंद के आह्वान पर फैसला होगा।
पहले दिन किसान सम्मेलन के तीन सत्र रहे
वीरवार को सम्मेलन में तीन सत्र रखे गए। पहला सीधे तौर पर तीनों कृषि कानूनों से संबंधित, दूसरा औद्योगिक श्रमिकों को समर्पित और तीसरा कृषि श्रमिकों, ग्रामीण गरीबों और आदिवासी मुद्दों से संबंधित था। सभी वक्ताओं ने किसानों, मजदूरों, महिला किसानों, कृषि श्रमिकों, आदिवासियों और आम लोगों को शामिल करते हुए आंदोलन को व्यापक व विस्तारित करने के लिए जोरदार ढंग से अपने सुझाव दिए। प्रत्येक सत्र में 15 वक्ताओं ने विचार-विमर्श किया और योगदान दिया। इस दौरान सम्मेलन स्थल पर किसान और मजदूर एकता के जयघोष गूंजते रहे।
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