हरियाणा के सोनीपत में युवती का अपहरण कर सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या करने के मामले में फांसी की सजा मिलने के बाद पीड़िता के माता-पिता ने कहा कि उनके कलेजे को ठंडक मिल गई है। लंबी लड़ाई के बाद ही सही न्यायपालिका ने उन्हें इंसाफ दिया है। वहीं पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता मोमिन मलिक ने इसे न्याय की जीत करार देते हुए कहा कि इसमें पुलिस व सरकार ने दोषियों को सजा दिलाने में पूरी मदद की।
पीड़िता की मां ने कोर्ट से बाहर आकर कहा कि उन्होंने न्याय पाने को लंबा इंतजार किया। उनके अधिवक्ताओं ने उनकी पूरी मदद की। जिस पर आज न्यायपालिका ने उन्हें इंसाफ दिया। दोषियों के साथी उन्हें लगातार धमकाते थे। उस दौरान उनके अधिवक्ता उनकी मदद करते थे। पीड़िता के पिता ने कहा कि दोषियों को अब वह जल्द फंदे पर लटकता देखना चाहते हैं।
उनकी बेटी ने बहुत दुख सहा था। अब दोषियों को फांसी मिलेगी तो उन्हें बेटी के दुख का अहसास होगा। मृतका के माता-पिता सजा सुनाए जाने के दौरान न्यायालय में ही थे। पीड़िता की मां न्याय कक्ष के अंदर थी, जबकि उनके पिता बाहर खड़े थे। सजा सुनाए जाने के दौरान वह दोनों भावुक हो गए।
मृतका के माता-पिता ने बताया कि बेटी कमाई से ही घर का खर्च चलता था। बेटी की मौत के कुछ माह बाद ही बेटे की भी हत्या कर दी गई। उनके जीवन का उद्देश्य बेटी के साथ दरिंदगी करने वालों को सजा दिलाना ही है। वह मजदूरी करके कानून की लड़ाई लड़ते रहे हैं। अब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई लड़ेंगे, लेकिन फांसी हो जाने तक चैन से नहीं बैठेंगे।
न्याय की हुई जीत : मोमिन मलिक
पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता मोमिन मलिक ने कहा कि आखिर न्याय की जीत हुई है। उन्होंने कहा कि न्याय के लिए उनके प्रयासों में पुलिस व सरकार ने भी मदद की। सरकार ने जहां एससी एसटी एक्ट लगने पर उन्हें इस केस में विशेष अधिवक्ता का दर्जा दिया था। वहीं पुलिस ने भी तेजी से कार्रवाई की। तत्कालीन एसपी अश्विन शैणवी ने स्वयं मामले की जांच कराई। दोषियों को पकड़वाया। ठोस सुबूत जुटाए। जिससे दोषी अपने अंजाम तक पहुंच सके हैं। उन्होंने कहा कि न्याय दिलाने का जो बीड़ा उन्होंने उठाया उसे पूरा किया है। दरिंदगी करने और हत्या के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। यह निर्भया जैसा ही वीभत्स मामला था। ज्यादातर मामलों में आरोपियों को सजा नहीं हो पाती है। ऐसे दोषियों को फांसी की सजा दिए जाने से यह मामला नजीर बनेगा। इससे ऐसे मामलों पर रोक लगने में मदद मिलेगी।
दोषियों ने बचाव को किया हर संभव प्रयास
सामूहिक दुष्कर्म के बाद जघन्यतम तरीके से हत्या के मामले में फांसी की सजा से बचने के लिए दोषियों ने हरसंभव प्रयास किया था। यहां तक की एक दोषी ने तो अपना नार्को टेस्ट कराने की मांग कर डाली। वहीं बचाव पक्ष के अधिवक्ता ने अपने तर्क प्रस्तुत किए। उसके चलते न्यायालय ने दोनों दोषियों का मेडिकल टेस्ट कराया। जिसमें दोनों मानसिक रूप से स्वस्थ पाए गए। यह फांसी की सजा का मजबूत आधार बना।
मामले में तीसरे आरोपी को किया बरी
मामले में एक अन्य आरोपी पंकज को गिरफ्तार किया गया था। अधिवक्ता मोमिन मलिक ने बताया कि वह जघन्य वारदात में शामिल नहीं था। उस पर आरोपियों की मदद करने का आरोप था। सुनवाई के दौरान उसके दोनों पैर खराब हो चुके है। जिस पर अदालत ने उसकी बड़ी भूमिका नहीं मानी।
सोनीपत जिले में पहले भी हो चुकी है फांसी की सजा
- सोनीपत न्यायालय ने फांसी की पहली सजा वर्ष 1983 में सुनाई थी। यह सजा लहना सिंह को सुनाई गई थी। उसने अपने भाई, माता व पिता को धारदार हथियार से काटकर हत्या कर दी थी।
- फरमाणा गांव के सुरेंद्र को वर्ष 2003 में फांसी की सजा सुनाई गई। उसने अपनी मां का उपचार करने वाले चिकित्सक के बेटे का अपहरण कर लिया था। कुकर्म के बाद बच्चे की हत्या कर शव को अपने बेड में छिपा लिया था। उसके बाद शव को एक ईंटों में दबा दिया था।
- शाहपुर गांव में धर्मपाल को वर्ष 1993 के मामले में फांसी की सजा हुई थी। उसने एक परिवार के तीन लोगों की हत्या कर दी थी। यह जिले का बहुचर्चित मामला रहा था। न्यायालय ने उसको फांसी की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 1999 में धर्मपाल की फांसी की सजा को सही ठहराया था। उनके भाई निर्मल को उम्रकैद मिली थी। बाद में धर्मपाल की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया।
- न्यायाधीश आरपी गोयल की ही अदालत ने 12 अक्तूबर 2021 इज्जत के नाम पर तीन लोगों की हत्या के मामले में दोषी हरीश को फांसी की सजा सुनाई थी। मामले में एक दोषी मोनू भगौड़ा है।
जेल जाने के बाद रोने लगे दोषी
फांसी की सजा सुनाने के बाद देर शाम दोनों दोषियों को जेल भेज दिया गया। न्यायालय की ओर से जेल प्रशासन को सजा सुनाए जाने का आदेश भेज दिया गया। जेल में पहुंचने पर दोनों दोषी रोने लगे। जेल में लंबे समय से उनके साथ रह रहे कैदियों-बंदियों को उनको समझाया। बाद में उन्हें जेल प्रशासन ने समझा कर खाना खिलाया। बताया गया है कि दोनों को सब्जी-रोटी खिलाई। जेल प्रशासन ने उनको सामान्य कैदियों-बंदियों के साथ ही रखा है।