सिरसा। अपने लिए तो सभी जीते हैं, लेकिन दूसरों के लिए जीना ही असली जिंदगी है। इस पर भी यदि खुद असहज और दूसरों पर निर्भर हो इसके बावजूद दूसरों के लिए काम करना और चिंता करना यह और बड़ी बात हो जाती है। सड़क हादसे में घायल होने के बाद दिमाग में एक ही विचार आता है कि अब भविष्य का क्या होगा। कैसे जीवन यापन होगा। लेकिन एक व्यक्ति ऐसा भी है जिसने इन सभी चिंताओं की फिक्र ना करते हुए सड़कों पर घूमने वाले बेसहाराओं को आसरा देने की योजना बनाई। बाधाएं बहुत भी लेकिन फिर भी काम किया, मेहनत की और लक्ष्य में सफल हुआ। हम बात कर रहे हैं भाई कन्हैया आश्रम के संचालक गुरविंद्र सिंह की। इन्होंने नागरिक अस्पताल में मरीजों के लिए नि:शुल्क दूध सेवा से शुरूआत की। आज उपलब्धि यह है कि 600 से ज्यादा बेसहाराओं को आसरा दिया। इतना ही नहीं 370 को अपने परिवारों से मिलवाया।
सेवा की कहानी सेवक की जुबानी
7 जून 1997 को स्कूटर पर ऐलनाबाद से सिरसा आ रहा था। रास्ते में सड़क हादसा हो गया। इलाज के लिए लुधियाना के डीएमसी में दाखिल करवाया गया। हादसे में अपने दोनों पैर खो दिए। रीढ़ की हड्डी में चोट लगी, तो शरीर का कमर से नीचे का हिस्सा बेकार हो गया। जिंदगी व्हील चेयर और बेड पर आ गई। विपदा आई कि अब क्या होगा। लेकिन इसके साथ-साथ ही देखा कि अस्पताल में कुछ लोग सुबह के समय मरीजों को दूध, दातुन और ब्रेड वितरित कर रहे हैं। मैंने पूछा तो पता चला कि जरूरतमंदों की सेवा में जुटे हैं। यही से दिमाग में आया कि क्यों ना सिरसा के अस्पताल में भी ऐसी ही सेवा शुरू की जाए। इसके बाद 1 जनवरी 2005 से नागरिक अस्पताल में समाजसेवी लोगों के साथ मिलकर दूध सेवा शुरू कर दी। साथ ही ऋषिपाल जिंदल, रंजीव गर्ग, सुधीर मरोदिया, गुरमीत सिंह व प्रियवर्धन के साथ मिलकर भाई कन्हैया मानव सेवा ट्रस्ट की स्थापना की। धीरे-धीरे सेवाओं में विस्तार हुआ और दूध सेवा कई केन्द्रों तक पहुंचा दी गई।
-स. गुरविंद्र सिंह, मुख्य सेवादार।
ऐसे हुई आश्रम की शुरूआत
भाई कन्हैया आश्रम के मुख्य सेवक स. गुरविंद्र सिंह बताते हैं कि नवंबर 2010 में एक औरत विक्षिप्त हालत में सड़क पर घूम रही थी। इसे सड़क से किसी सुरक्षित जगह पर भेजने की कोशिश की तो किसी ने बताया गया कि इसे पिंगलबाड़ा में आश्रम है, वहां पर छोड़ आएं। इंटरनेट पर सर्च किया तो पता चला कि अमृतसर में पिंगलबाड़ा आश्रम है। लेकिन पुलिस कार्रवाई, एक आश्रम से दूसरे आश्रम में संपर्क की प्रक्रिया लंबी होती चली गई। इसमें बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ा। ऐसे में उस महिला की सड़क पर ही मौत हो गई। इस घटना ने मुझे झकझोर दिया। इसके बाद शहर में ही तकनीकी कॉलेज के पास 200 गज का प्लॉट लिया और आश्रम स्थापित कर डाला। ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा ना आए। इस आश्रम में अभी तक 600 से ज्यादा बेसहारा मंदबुद्धि, दिव्यांगों को सहारा दिया गया है। इस समय आश्रम में 335 बेसहारा रह रहे हैं। जबकि 370 का सफलतापूर्वक इलाज के बाद उन्हें अपने परिवारों से भी मिलवा दिया गया है। आश्रम में इस समय 44 बच्चे भी हैं। जिनका इलाज संभाल और शिक्षा का प्रबंध किया जा रहा है। इसके अलावा 22 बेसहारा बुजुर्ग भी हैं।
सड़क हादसों में घायलों के लिए शुरू की एंबुलेंस सेवा
भाई कन्हैया मानव सेवा ट्रस्ट की ओर से वर्ष 2015 में एंबुलेंस सेवा की शुरूआत की गई। इसका उद्देश्य रखा गया कि सड़क हादसों में घायल होने वालों को अस्पताल में दाखिल करवाएं, ताकि उनकी जान बचाई जा सके। एंबुलेंस सेवा के माध्यम से अभी तक 3600 से ज्यादा सड़क हादसों में नि:शुल्क सेवा दी गई है और मरीजों व घायलों को अस्पताल तक पहुंचाया गया है। इसके अलावा 2300 से ज्यादा गर्भवती महिलाओं को डिलीवरी के लिए अस्पताल तक सुरक्षित तरीके से भेजा गया। ट्रस्ट के पास इस समय 8 एंबुलेंस है, जो सिरसा, रानियां, ऐलनाबाद में होने वाले सड़क हादसों और आपातकालीन सेवाओं में सेवा देती हैं।
अब शिक्षा के लिए प्रयास: स्कूल खोलने की है तैयारी
भाई कन्हैया सेवा ट्रस्ट अपनी सेवाओं में विस्तार करेगा। इसके लिए योजना बना ली गई है। उम्मीद है कि इस पर जल्द काम शुरू हो जाएगा। गुरविंद्र सिंह बताते हैं कि ट्रस्ट की ओर से अब भाई कन्हैया पब्लिक स्कूल स्थापित किया जाएगा। इसके लिए नेशनल हाईवे पर स्कूल के लिए भूमि खरीद ली गई है। इस स्कूल में नि:शुल्क शिक्षा उपलब्ध करवाई जाएगी। इसमें भाई कन्हैया आश्रम के और अन्य अनाथालयों के बच्चों को फ्री शिक्षा मिलेगी। जिन बच्चों के माता-पिता नहीं है और रिश्तेदारों के पास रह रहे हैं उन्हें भी दाखिला मिलेगा। पिता का साया जिस के सिर से उठ गया है और मां मजदूरी करती हो, या फिर आर्थिक तंगी और किसी बीमारी से ग्रस्त माता-पिता के बच्चों को भी स्कूल में जगह मिलेगी। इस स्कूल की नींव रखी जा चुकी है।
केस स्टडी
1. कर्नाटक से सिरसा का सफर
12 फरवरी 2015 को एक मंदबुद्धि महिला को लाया गया। उसका इलाज और सेवा शुरू की गई। वह महिला कन्नड़ बोलती थी इसलिए उसकी पहचान और समस्या जानने में दिक्कत होती थी। लेकिन कुछ दिन बाद सिरसा में एसपी अश्विन शैणवी आए तो पता चला कि वे कर्नाटक से हैं। एसपी ने औरत से बात की तो पता चला कि उसका नाम वेदा है और कोलार जिले की रहने वाली है। उनके माध्यम से कोलार पुलिस से संपर्क किया गया और घर तक पहुंचे। अगले दिन उसका भाई दिल्ली और फिर सिरसा पहुंचा। वेदा के भाई ने बताया कि उसकी मानसिक हालत ठीक नहीं थी और इलाज चल रहा था। गांव वालों के कहने पर उसका पति किसी तांत्रिक के पास ले गया था। जहां उसके बाजूओं पर सलाखें दागी गई। इससे परेशान होकर वह भाग गई। सड़क हादसे में मरने वाली किसी औरत का पता चला तो सोचा कि उनकी बहन मर चुकी है। लेकिन बाद में उसे जिंदा देखकर उनकी खुशी का ठिकाना नहीं था।
केस 2.
राजस्थान के श्रीगंगानगर से एक एनजीओ ने मंजू नाम की महिला को आश्रम में भेजा। उसकी मानसिक स्थिति खराब थी। एनजीओ ने बताया कि यह महिला श्रीनगर की है, लेकिन अचरज इस बात का था कि वह कश्मीरी भाषा नहीं बल्कि बंगाली बोलती थी। इस पर आश्रम के सेवादारों ने खूब मेहनत की। एक बंगाली बोलने वाले से जब संपर्क किया और महिला की बात करवाई तो पता चला कि मंजू बंगाल की रहने वाली है और इसकी शादी श्रीनगर में हुई है। मंजू का एक बेटा भी है। उससे संपर्क किया तो वह लेने के लिए आ गया। मंजू के बेटे का नाम एजाज खान था। बेटे ने बताया कि 2013 में उसके पिता का निधन हो गया है और उसकी मां सदमे में चली गई। 2014 में बाढ़ में घर से गुम हो गई। जब बेटा अपनी मां से मिला तो उसकी आंखों में खुशी के आंसू थे। वह खुशी-खुशी अपनी मां को लेकर घर चला गया। आश्रम के सेवादारों का धन्यवाद करते हुए वह उनका काफी आभार जता रहा था।