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अब तक 9 हजार 770 मामलों का हुआ निपटारा, 3,047 केस अभी विचाराधीन

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सिरसा। जिले में पारिवारिक विवाद बढ़ते ही जा रहे हैं। शादी के बाद छोटी-मोटी बातों को आपस में सुलझाने की बजाय बात सीधा तलाक तक पहुंच जाती है। आलम ये है कि दिसंबर 2018 से जनवरी 2022 तक फैमिली कोर्ट में पारिवारिक विवाद से जुड़े 12 हजार 819 केस आ चुके हैं। इस आंकड़े से पता चल जाता है कि मौजूदा फास्ट लाइफ में परिवारों में कितनी अशांति है और सात फेरे लेते समय किया गया सात जन्मों तक साथ निभाने का वादा शादी के कुछ समय या सालों के बाद टूट रहा है। पति-पत्नी एक-दूसरे से संतुष्ट न होकर समाधान के लिए फैमिली कोर्ट में पहुंच रहे हैं। फैमिली कोर्ट में आ रहे मामलों में ज्यादातर मामलों का निपटान जल्द ही आपसी समझौता करवाकर किया जाता है। जिले में फैमिली कोर्ट की स्थापना 21 दिसंबर 2018 को हुई थी। कोर्ट में अब तक हिंदू मैरिज एक्ट के तहत 6 हजार 906 केस आ चुके हैं। मार्च 2022 तक कोर्ट ने इनमें से 5 हजार 5755 केसों का निपटारा कर दिया। अब करीब 1151 केस कोर्ट में लंबित हैं। क्रिमनल केसों की बात करें तो मार्च 2022 तक 4 हजार 775 केस कोर्ट में आए। इनमें से अब 1583 केस लंबित हैं। फैमिली कोर्ट मेें अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश जसबीर सिंह कुंडू हैं।
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10 लाख आबादी पर स्थापित की जाती है कोर्ट
वरिष्ठ महिला अधिवक्ता ज्योति बतरा ने बताया कि विवाह और पारिवारिक बातों से संबंधित विवादों में सुलह और समझौते कराने और विवादों को जल्द निपटाने के लिए 1984 में फैमिली कोर्ट एक्ट पारित किया गया था। इसके तहत हर नगर में पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना की गई है। इस कानून के लागू होने के बाद राज्य सरकारें किसी नगर या कस्बे के ऐसे क्षेत्र के लिए जिसकी जनसंख्या दस लाख से अधिक है पारिवारिक न्यायालय यानी फैमिली कोर्ट की स्थापना करती है। पारिवारिक न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए न्यायाधीश को काफी अनुभवी होना चाहिए। इसलिए ऐसा व्यक्ति पारिवारिक न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया जाता है, जो कम से कम 7 वर्षों तक न्यायिक पद रहा हो।
इन विवादों का किया जाता है निपटारा
विवाह को शून्य घोषित करना।
तलाक का मामला।
दांपत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना।
न्यायिक पृथक्करण।
विवाह की विधि मान्यता।
भरण पोषण से संबंधित वाद।
ऐसे काम करती है कोर्ट
फैमिली कोर्ट अधिकतर मामलों में प्रयास करती है कि मामला आपसी सुलह और समझौते से खत्म हो जाए। यदि पारिवारिक न्यायालय को ऐसा लगता है कि दोनों पक्षों के बीच समझौता की संभावना है, तो परिवार न्यायालय कार्रवाई को ऐसे समय के लिए स्थगित कर सकता है ताकि समझौता हो सके। पारिवारिक न्यायालय सिविल कोर्ट समझा जाता है और उसे सिविल कोर्ट की सारी शक्तियां होती है।
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बंद कमरे में होती है सुनवाई
पारिवारिक न्यायालय की एक मुख्य विशेषता यह होती है कि इसकी सुनवाई बंद कमरे में की जा सकती है। किसी पारिवारिक न्यायालय के समक्ष कार्रवाई में यह आवश्यक नहीं है कि गवाहों का साक्ष्य विस्तार से लिखा जाए। पारिवारिक न्यायालय के द्वारा पारित किसी भी आदेश का वही प्रभाव होगा, जो किसी सिविल न्यायालय का होता है और उसका निष्पादन सिविल न्यायालय के आदेश के निष्पादन के तौर तरीकों से ही होगा।
हाईकोर्ट में होती है अपील
पारिवारिक न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है। यह अपील तथ्य और विधि दोनों के संबंध में की जा सकती है, लेकिन जहां फैमिली कोर्ट द्वारा पक्षकारों की सहमति से आदेश पारित किया गया है तो अपील नहीं होगी। न्यायालय के निर्णय आदेश की तारीख से 30 दिन के भीतर अपील की जा सकती है।
जिले में पारिवारिक विवाद से जुड़े मामले बढ़ते जा रहे हैं। फैमिली कोर्ट में हजारों मामले 2018 से अब तक आ चुके हैं। अधिकांश मामले पति-पत्नी के बीच अनबन से जुड़े हैं। फैमिली कोर्ट दोनों पक्षों में आपसी सुलह और समझौते से मामले का निपटारा करने पर जोर देती है, लेकिन समझौते की संभावना नहीं दिखने पर न्यायालय दोषी पर कार्रवाई करता है। फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ केवल पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में ही अपील की जा सकती है।
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-संजू बाला, वरिष्ठ महिला अधिवक्ता सिरसा।
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