जिले की प्रमुख विधानसभा सीट सिरसा का चुनावी इतिहास बेहद रोचक रहा है। यहां से सबसे अधिक 10 बार पूर्व मंत्री स्वर्गीय लक्ष्मणदास अरोड़ा चुनावी दंगल में अपनी किस्मत अजमा चुके हैं। जबकि उन्हें केवल 5 बार विधायक बनने का अवसर मिला। वहीं राजनीतिक पार्टी की बात करें तो 5 बार कांग्रेस, 3 बार लोकदल, 2 बार निर्दलीय व एक-एक बार भाजपा, हलोपा को जीत नसीब हुई है।
सबसे अधिक चुनाव लड़ चुके लक्ष्मणदास अरोड़ा ने पहले 1967 के चुनावों में बीजेएस पार्टी के बैनर तले कांग्रेस के सीताराम को 5067 मतों से हराया था। इसके एक साल बाद 1968 में हुए चुनावों में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। मगर इसके बाद 1972 से लेकर 2009 तक लगातार 9 चुनाव लड़े। जिसमें 1982 के चुनावों में उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में भाजपा के महावीर रातुसरीया को 1780 वोटों से हराकर जीत दर्ज की थी।
तीसरी जीत उन्हें 10 वर्ष बाद 1991 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी की ओर से नसीब हुई। जिसमें उन्होंने भाजपा के प्रोफेसर गणेशी लाल को 18995 मतों से हराया था । वहीं 2000 व 2005 के चुनाव में वह लगातार दो बार सिरसा से कांग्रेस पार्टी से विधायक बनें। वर्ष 2000 में यहां उन्होंने भाजपा के जगदीश चोपड़ा को 15091 वोटों से हराया। वहीं 2005 में इनेलो के पदम जैन को 15304 मतों से हराया था। उधर 2009 के आखिरी चुनाव में उन्हें निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में गोपाल कांडा से हार का मुंह देखना पड़ा था, इस चुनाव में वह तीसरे नंबर पर रहे थे।
दोहता गोकुल सेतिया मैदान में
पूर्व मंत्री लक्ष्मणदास अरोड़ा की अगली पीढ़ी से अब दोहता गोकुल सेतिया निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में इस 2019 के चुनाव में अपनी किस्मत अजमा रहे हैं। उन्हें इनेलो का समर्थन हासिल है। वहीं उनकी पुत्री सुनीता सेतिया 2014 के चुनाव में भाजपा की उम्मीदवार थी मगर उन्हें जीत नसीब नहीं हो सकी थी।
भाजपा को एक बार प्रो. गणेशी लाल ने दिलाई थी जीत
इससे पहले भाजपा इस सीट से 7 बार चुनाव में अपनी किस्मत अजमा चुकी है। उसे केवल एक बार 1996 के चुनावों में प्रो. गणेशी लाल ने जीत दिलाई थी। उस समय उन्होंने कांग्रेस के लक्ष्मणदास अरोड़ा को 3820 मतों के अंतर से हराया था। अब 2019 में 8वीं बार भाजपा प्रत्याशी प्रदीप रातुसरिया इस सीट से चुनावी मैदान में हैं।