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एग्रीकल्चर: फतेहाबाद के जगदीश और सिरसा के परसाराम ने परंपरागत खेती छोड़ अपनाई बागवानी, जानिए कितनी बढ़ी आमदनी

Tue, 14 Dec 2021 05:58 PM IST
भूपेंद्र सिंह विकास छिंपा/नरेश बैनीवाल, संवाद न्यूज एजेंसी, भूना/फतेहाबाद, चौपटा/सिरसा (हरियाणा) 

सार

किसान के पास जमीन थोड़ी हो और पूरे परिवार का पालन पोषण खेती की आमदनी पर निर्भर हो तो परंपरागत खेती से आमदनी कम होने पर काफी मुश्किल उठानी पड़ती हैं। नहरी पानी की कमी, सेम के कारण जमीन का खारा पानी, बारिश समय पर ना होना, फसलों में विभिन्न प्रकार की बीमारियों व अन्य प्राकृतिक आपदाओं के आने से किसानों को परंपरागत खेती से घाटा होने लगा है। इस घाटे को पूरा करने के लिए किसान खेती के साथ-साथ नई तरकीब सोच कर आमदनी बढ़ाने की कोशिश करता है।
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सिरसा के किसान परसाराम और फतेहाबाद के जगदीश अपनी खेती के बारे में बताते। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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हरियाणा के फतेहाबाद जिले के भूना क्षेत्र के गांव धौलू के किसान जगदीश मंगलाव ने अपने दो बेटों के साथ मिलकर परंपरागत खेती को छोड़कर पांच साल पहले बागवानी व सब्जियों की खेती में किस्मत को आजमाया। जिसके बलबूते पर जगदीश मंगलाव का परिवार आज आर्थिक रूप से संपन्न हो चुका है। किसान जगदीश व परिवार की मेहनत के बाद वे आर्थिक रूप से संपन्न हुए हैं। पहले वे आढ़ती पर निर्भर थे। 

परंपरागत खेती को बदलकर बागवानी में भविष्य बनाया 

जगदीश ने लगभग पांच साल पहले अपनी 7 एकड़ कृषि योग्य भूमि में गेहूं, धान व नरमा की परंपरागत खेती को बदल दिया था। जगदीश ने आलू बुखारा व आडू के ढाई सौ तथा नींबू के 300 पौधे लगाए। जिनकी बच्चों की तरह देखभाल की। दो साल की मेहनत के बाद पौधों पर फल आया तो जगदीश की आंखों में खुशी की चमक आ गई। फसल का किसान को अच्छा दाम मिला। जिससे उसकी आर्थिक स्थिति ठीक होने लगी। जगदीश के छोटे बेटे आईटीआई पास पवन कुमार ने पपीते लगाने के बारे में अपने पिता व बड़े भाई राजेंद्र सिंह से सलाह मशवरा करके पौधे लगाए।

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जिसके बाद उन्हें पपीते की फसल में भी काफी मुनाफा हुआ। बागवानी से हुई आय से किसान के घर में अब सुख सुविधा के सभी साधन हैं। किसान के बेटे पवन कुमार ने बताया कि पपीते का बीज चार लाख रुपये प्रति किलो के हिसाब से लेकर बिजाई की शुरुआत की थी। उन्नत किस्म के बीज से तैयार 300 पौधों से कई क्विंटल फसल ले चुके हैं। वहीं 300 के लगभग नींबू के पौधे विकसित हो चुके हैं और अच्छा फल दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि इसके अतिरिक्त सवा एकड़ में गाजर की फसल की बिजाई की हुई है। उससे भी अच्छी आमदनी की संभावना है। उन्होंने बताया कि बाग व सब्जियों में मेहनत अधिक करनी पड़ती है। लेकिन परंपरागत खेती के बदलने से दो से तीन गुना ज्यादा आमदनी होती है।

सरकार एवं प्रशासन बागवानी में नहीं देते कोई सब्सिडी या अनुदान

किसान जगदीश ने बताया कि सरकार एवं प्रशासन की तरफ से परंपरागत खेती को बदलने के लिए बागवानी में किसी तरह की सब्सिडी या अनुदान नहीं मिलता। कागजों में सब्सिडी का मात्र ढिंढोरा पीटा जाता है। बाग में अगर पौधों को पानी की सिंचाई के लिए ड्रिप सिस्टम व वाटर स्टॉक टैंक तथा पौधों पर सब्सिडी एवं अनुदान दे तो परंपरागत खेती में बदलाव बड़े स्तर पर हो सकता है। किसानों के बाग में पौधों की सुरक्षा को लेकर लोहे की जाली या तार की बाउंड्री पर भी अनुदान दिया जाना चाहिए। बाग में पौधों की बीमारी की जांच के लिए उद्यान विभाग के डॉक्टरों को समय-समय पर ग्रामीण क्षेत्र में मौके पर आना चाहिए। लेकिन उन्हें 5 साल में ऐसी कुछ भी सरकारी सहायता एवं सब्सिडी नहीं मिल पाई है।

किसानों को बागवानी में बढ़ावा देने के लिए सरकार विभिन्न प्रकार की योजनाओं के माध्यम से सब्सिडी दे रही है लेकिन कई किसान जागरूकता के अभाव में इसका लाभ नहीं ले पाते हैं। किसान परंपरागत खेती को छोड़कर बागवानी एवं सब्जियों में कई गुना मुनाफा लेकर आर्थिक रूप से संपन्न हो रहे हैं। बागवानी में पौधे बीमारी ग्रस्त हो तो उसकी सूचना उद्यान विभाग को जरूर देनी चाहिए ताकि पौधे को बीमारी से बचाया जा सके। - डॉ. देवीलाल विषय विशेषज्ञ अमरूद, अमरूद केंद्र भूना एवं अतिरिक्त जिला बागवानी अधिकारी फतेहाबाद

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परसाराम ने थाई एप्पल बेर व अमरूद का बाग लगाकर खोजा अतिरिक्त कमाई का जरिया

गांव बरासरी (सिरसा ) के किसान परसाराम ने अपने भाई सुशील कुमार के साथ मिलकर तीन साल पहले अपने खेत में दो एकड़ में थाई एप्पल बेर और दो एकड़ में अमरूद का बाग लगाकर परंपरागत खेती के साथ आमदनी का दूसरा जरिया खोजा। दो साल बाद थाई एप्पल बेर व अमरूद से करीब 4 लाख रुपये प्रतिवर्ष अतिरिक्त कमाई होने लगी।

थाई एप्पल बेर और अमरूद स्वास्थ्य के लिए है बेहद गुणकारी

मात्र 10वीं कक्षा तक पढ़े किसान परसाराम पुत्र कुरड़ा राम ने घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए खेती के साथ-साथ अन्य कमाई का जरिया खोजना शुरू किया। भूना के पास बैजलपुर गांव में एक किसान के खेत में थाई एप्पल बेर का बाग देखा तथा उनसे प्रेरणा लेकर तीन साल पहले 2 एकड़ भूमि में थाई एप्पल बेर का बाग लगाया।

उन्होंने बताया कि उकलाना से थाई एप्पल बेर के पौधे लाकर अपने खेत में लगाए। इसके साथ ही बैजलपुर से अमरूद के पौधे लाकर 2 एकड़ जमीन में लगाए। उन्होंने बताया कि इस बाग में खर्चा कम होता है और मेहनत भी कम करनी पड़ती है। पौधे को ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है और पैदावार अच्छी हो जाती है। पहली बार बाग से 4 लाख रुपये के बेर व अमरूद बेचकर कमाई की। उन्होंने बताया कि थाई एप्पल बेर में मिठास ज्यादा होती है और खाने में सेब जैसा स्वाद होता है। यह स्वास्थ्य के लिए भी काफी लाभप्रद है। उन्होंने बताया कि खेती के साथ-साथ बेर व अमरूद के बाग से कमाई होने से उनके घर की आर्थिक हालत काफी अच्छी हो गई।

उन्होंने बताया कि थाई एप्पल बेर साल में दो बार लगते हैं, लेकिन गर्मियों के मौसम में इसके फल खराब होने का अंदेशा ज्यादा रहता है। सर्दियों के मौसम में फलों की पैदावार भी ज्यादा होती है। उन्होंने बताया कि बाग के पौधों की लाइन में खाली पड़ी जमीन में वह मौसमी सब्जियां उगाते हैं। जिनसे उनको अतिरिक्त कमाई मिलती है।

बेर का बाग लगाने के बाद किसान परसाराम को आसपास के गांव में अच्छी पहचान मिली। आसपास के गांव के लोग थाई एप्पल बेर के बाग को देखकर उनसे जानकारी लेकर अब बाग लगाने लगे हैं। परसाराम का कहना है कि किसान परंपरागत खेती के साथ जमीन की उपजाऊ शक्ति के अनुसार किन्नू, अमरूद, थाई एप्पल बेर, अंगूर इत्यादि का बाग लगाकर कमाई करके पूरी तरह से आत्मनिर्भर बन सकते हैं।

मंडी दूर होने के कारण यातायात खर्च हो जाता है ज्यादा 

किसान परसाराम ने बताया कि उनके गांव के आसपास फलों की मंडी या फ्रूट प्रोसेसिंग प्लांट ना होने के कारण उन्हें काफी परेशानी उठानी पड़ती है। फलों को बेचने के लिए हिसार, जींद, करनाल या पंजाब में लेकर जाना पड़ता है। जिससे यातायात खर्चा ज्यादा हो जाता है। इनकी मांग है कि नाथूसरी चोपटा में फलों की मंडी या फ्रूट प्रोसेसिंग प्लांट विकसित हो जाए तो यातायात खर्च कम होने से बचत ज्यादा हो जाएगी। इसके साथ ही सरकार को फलों की खेती करने के लिए अनुदान या लोन का सरलीकरण किया जाना चाहिए।
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