सिरसा। जिला के छोटे से गांव जोधकां से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हॉकी का लोहा मनवाने वाली सविता पूनिया को बेशक अर्जुन अवार्ड मिल चुका है और अनेक मेडल अपने नाम कर चुकी हैं, लेकिन आज भी ए-क्लास नौकरी का इंतजार है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मैचों में भाग लेने पर सरकार बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन धरातल पर आज भी सुविधाओं का टोटा है। ओलंपिक में भाग लेकर लौटीं सविता पूनिया ने कुछ दिन बाद फिर सख्त ट्रेनिंग की तैयारियां शुरू कर दी है।
सिरसा की बेटी सविता पूनिया अपने गांव से हॉकी खेलकर आगे बढ़ी और स्टेट के बाद नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया। मैदान में दूसरी टीम के सामने दीवार बनकर खड़ी हो जाती है और गोल रोकती है। खेलों में भाग लेने और उपलब्धियों के आधार पर ही अर्जुन अवार्ड से भी सम्मानित हो चुकी हैं। लेेकिन सरकार के दावों के बावजूद आज तक सविता को ए-क्लास नौकरी नहीं मिल पाई है। हालांकि क्लास-2 स्तर जैसे खेल विभाग में कोच आदि के लिए नौकरी के ऑफर आए लेकिन सविता ने उन्हें ठुकरा दिया है। संवाद
अब फिर से शुरू होगी मेहनत, देश के लिए खेलती रहूंगी : सविता
ओलंपिक से भाग लेकर लौटने पर मुझे देशवासियों की ओर से पूरा मान सम्मान मिला है। इस दौरान अब कुछ दिन परिवार से भी मिली और मौज मस्ती के साथ समय व्यतीत किया है। कपिल शर्मा के कॉमेडी शो में भी भाग लेने का मौका मिला। लेकिन अब एक बार फिर मैंने आगे के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। अगले महीने की 10 तारीख के बाद एकेडमी में अभ्यास शुरू कर दूंगी। क्योंकि अगले वर्ष कई बड़े आयोजन हैं। सरकार की ओर से नौकरी की आस है जो अभी तक अधूरी है।
प्रेरणा : सविता से प्रेरित होकर गांव की लड़कियों की फुटबाल टीम तैयार, लेकिन सुविधा का अभाव
गांव जोधकां से हॉकी खिलाड़ी सविता पूनिया से प्रेरित होकर अब गांव की दूसरी बेटियों ने भी तैयारी शुरू कर दी है। हालांकि गांव में हॉकी मैदान की उम्मीद करना ही बेमानी है लेकिन गांव की लड़कियों की फुटबाल टीम तैयार हो चुकी है। यहां से ना केवल जिला, राज्य स्तर पर बल्कि नेशनल लेवल पर भी फुटबाल खिलाड़ी खेलने जा चुके हैं और मेडल भी लेकर आए हैं। लेकिन गांव में आधारभूत सुविधाओं का अभाव है। गांव में खेल विभाग की ओर से मैदान की तो बात बेमानी है बल्कि कोच की सुविधा भी नहीं दी है। ऐसे में गांव की लड़कियों ने स्कूल के पीछे खाली मैैदान को अभ्यास के लिए अपने स्तर पर तैयार किया है। कोच ना होने पर गांव का ही एक युवक इन्हें ट्रेनिंग देता है। यदि प्रशासन और सरकार की ओर से मैदान, कोच और अन्य आधारभूत सुविधाएं मिल जाएं तो गांव की अन्य बेटियां भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दमखम दिखा सकती हैं।