पिछले साल 26 हजार डिलीवरी पर 15 महिलाओं की हुई मौत
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मातृ-शिशु मृत्यु दर में पिछले वर्षों की अपेक्षा वर्ष 2016 में काफी सुधार रहा है। हालांकि जिले में स्वास्थ्य विभाग की व्यवस्थाएं आज भी ‘बीमार’ ही नजर आ रही है। जिले में कहीं चिकित्सक नहीं है तो कहीं अधिकारियों के कार्यालयों में खड़ी एंबुलेंस के लिए ड्राइवर तक नहीं है।
प्रदेश सरकार ने सत्ता में आने के बाद चिकित्सा सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए प्रयास किए हैं। यह प्रयास कितने कारगर सिद्ध हो रहे हैं इसका नजारा सरकारी अस्पताल में मिलने वाली सुविधाओं से पता चलता है। जिले में डॉक्टरों की बात करें तो 131 पोस्ट के सापेक्ष मात्र 96 डॉक्टर ही कार्यरत हैं। इससे ज्यादा दयनीय हालत क्या होगी कि जिले में विभाग के पास एक भी मनोरोग चिकित्सक नहीं है। ऐसे में यदि कोई मनोरोगी उपचार के लिए आता है तो उसे पीजीआईएमएस में भेज दिया जाता है। विभाग के पास 14 एंबुलेंस में से पांच की हालत जर्जर हो चुकी है। वहीं सिविल सर्जन कार्यालय में खड़ी एक एंबुलेंस पिछले करीब छह माह से ड्राइवर का इंतजार कर रही है। हालांकि इन सबके बीच राहत भरी खबर यह है कि वर्ष 2016 में मातृ-शिशु मृत्यु दर में काफी सुधार हुआ है। वर्ष भर में हुई 26394 डिलीवरी पर 15 महिलाओं की मौत हुई। पिछले वर्षों के मुकाबले इस साल के आंकड़े में काफी हद तक सुधार आया है।
सीएम के गांव की पीएचसी का हाल बेहाल
इसी माह के शुरुआत में सीएम के गांव निंदाना और फरमाना में पीएचसी का उद्घाटन हुआ था। सीएम का गांव होने के बावजूद यहां पर अभी तक डॉक्टरों की पोस्ट सेंशन नहीं हुई। विभाग की तरफ से वहां पर फिलहाल अस्थाई डाक्टरों को नियुक्त किया गया है।
कुछ ऐसा है विभाग का आंकड़ा
वर्ष 2016 में 26,394 डिलीवरी हुई। इसमें से 15 महिलाओं की मौत हुई। 2015 में 23,683 डिलीवरी में से 20 महिलाओं ने दम तोड़ा था। इसके अलावा वर्ष 2014 में 24,808 महिलाओं की डिलीवरी हुई, जिसमें 24 महिलाओं की मौत हुई। इसी तरह 2016 में 313 और 2015 में 324 शिशु मृत पैदा हुए।