मन में अगर जोश हो, उमंग हो, जज्बा हो तो कामयाबी मिलने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती है। परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों जरूरत सिर्फ दृढ़ संकल्प के साथ निर्णय लेने की होती है। आज हम बात कर रहे हैं शहर के एक ऐसे परिवार की जिन्होंने पाकिस्तान और पंजाब में हुए दंगों के जख्मों को भरने के लिए कामयाबी की इबारत लिख डाली।
मेहनत के दम पर आज चौथी पीढ़ी के पास बड़े-बड़े शोरूम
शहर के पुनियानी परिवार ने एक नहीं, बल्कि दो बार दंगों का दंश झेला। इसके बाद भी यह परिवार अपनी मेहनत के दम पर आज कामयाबी के शिखर पर है। किला रोड पर खुद का शोरूम और दिल्ली में भी कारोबार है। पूर्वजों ने जो मेहनत की उसे आगे बढ़ाते हुए चौथी पीढ़ी कपड़े के कारोबार में हाथ बढ़ा रही है।
1947 में हुए दंगों में दुकान को जला दिया गया
हिसार रोड स्थित स्पेयर पार्ट की दुकान चला रहे 67 वर्षीय लाजपत पुनियानी ने बताया कि उसके दादा अमीर चंद पुनियानी पाकिस्तान के झंग जिले के कोट सुल्तान में परचून की दुकान चलाते थे। 1947 में हुए दंगों में दुकान को जला दिया गया। वह रातों-रात परिवार को लाहौर से अमृतसर होते हुए लुधियाना ले आए। अमृतसर रेलवे स्टेशन पर उसकी दादी पार्वती देवी का ट्रक चोरी हो गया, जिसमें जेवरात व नकदी थी।
किला रोड बाजार में कारोबार
कुछ समय लुधियाना में कामकाज करने का प्रयास किया, लेकिन उसके पिता हरिचंद वहां से रोहतक आ गए, यहीं गांधी कैंप में उनकी शादी हुई। वह छह भाई थे। सबसे बड़े भाई रमेश पुनियानी, उसके लापजत, सतीश, इंद्रपाल, नरेन दा व नीरज कुमार हैं। रमेश पुनियानी का देहांत हो चुका है। उसे छोड़कर बाकी का किला रोड बाजार में कारोबार है।
1984 के दंगों में जला दी सुनाम में दुकान
किला रोड के उप प्रधान दीपक पुनियानी ने बताया कि उसके पिता रमेश पुनियानी कामकाज की तलाश में पंजाब के सुनाम चले गए, जहां पीरा वाला गेट पर कपड़े की दुकान की। 1984 के दंगों में उनकी दुकान को जला दिया गया। शहर में धारा 144 लग गई। एक घंटे के लिए जब ढील दी गई तो उसके पिता छत के रास्ते कूदकर दूध लेकर आते थे। इसके बाद अगले साल वह रोहतक आ गए।
पिता ने चलाया ऑटो, मैंने छोड़ दी 7वीं के बाद पढ़ाई
किला रोड बाजार के उप प्रधान दीपक पुनियानी ने बताया कि सुनाम से वापस आकर पिता ने शून्य से शुरूआत की। पहले उसके पिता ने ऑटो चलाया। इसके बाद किला रोड पर फड़ी लगाई। सातवीं पिता का साथ देने के लिए पढ़ाई छोड़ दी। इसके बाद धीरे-धीरे कारोबार जम गया। पिता कभी-कभी घूम-घूमकर कपड़ा बेचकर आते थे। इसके बाद पहले पाड़ा मोहल्ला तो फिर गुरुनानकपुरा में घर लिया। किसी तरह किला रोड पर दुकान खरीदी, जिसे मेहनत के दम पर शोरूम का दर्जा दिया। 2019 में पिता का देहांत हो गया। आज चौथी पीढ़ी उनकी मेहनत के दम पर खड़े किए कारोबार को आगे बढ़ा रही है।