सही समय और भूमि को देखकर ही सरसों की बिजाई के लिए चुनें सही किस्म
सुधीर श्योराण
हिसार। एक अक्टूबर से सरसों की बिजाई शुरू हो चुकी है। वैसे तो प्रदेशभर में सरसों की विभिन्न किस्मों की बिजाई की जाती है। सिंचित भूमि, बिरानी भूमि और पछेती बिजाई के लिए अनेक सरकारी और प्राइवेट किस्म उपलब्ध है। किसान अपनी भूमि व बिजाई के समय को देखकर सही किस्म को चुनाव करे तो अधिक पैदावार ले सकता है।
सिंचित भूमि व समय पर बिजाई की किस्म
आरएच- 130 सरसों की इस किस्म का बिजाई का समय एक अक्टूबर से 31 अक्टूबर तक कर सकते हैं। इसकी पैदावार एक एकड़ में 20 से 22 मण तक रहती है। इस किस्म के लिए दो पानी की आवश्यकता होती है।
आरएच- 8812
इसकी बिजाई भी 31 अक्टूबर तक कर लें। इसकी पैदावार 24 से 25 मण प्रति एकड़ तक रहती है। इसके लिए एक पानी की आवश्यकता है।
आरएच- 9403
इसकी बिजाई भी अक्टूबर के महीने में करें। इस पैदावार 23 से 25 मण प्रति एकड़ तक रहती है। इसमें एक पानी की आवश्यकता है। दूसरा पानी अगर जरूरत हो तो ही करें।
आरएच- 749
ये हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने नई किस्म तैयार की है जोकि अगले साल तक किसानों को मिल जाएगी। इसकी पैदावार 28 से 30 मण तक होने का अनुमान है।
बिरानी भूमि के लिए
आरएच- 119
बिरानी भूमि में ये किस्म कारगर साबित हो रही है। इसकी बिजाई भी अक्टूबर महीने में करें। इसकी पैदावार 18 से 20 मण प्रति एकड़ है। इसके लिए एक पानी की आवश्यकता है।
आरएच- 406
बिरानी भूमि के लिए ये किस्म किसानों की पहली पसंद है। इसकी पैदावार 22 से 24 मण प्रति एकड़ है। इसके लिए नहरी पानी की आवश्यकता नहीं है। यह बारिश के पानी में हो जाती है।
आरएच- 725
हिसार जिले के कई किसान इस किस्म की बिजाई करते हैं। इसकी पैदावार बिरानी किस्मों मेें सबसे अधिक है। 25 से 26 मण प्रति एकड़ तक इसकी पैदावार होती है।
आरबी- 50
बावल रिसर्च सेंटर ने यह नई किस्म चिह्नित की है। इसको नोटिफिकेशन के लिए भेजा गया है। जो अगले साल तक किसानों को मिल सकेगी।
सरसों की पछेती किस्म
आरएच- 130
जो किसान सरसों की बिजाई में लेट हो जाते हैं। वो इस किस्म की बिजाई कर सकते हैं। इसकी पैदावार 17 से 18 मण प्रति एकड़ तक रहती है। इसके लिए एक पानी की आवश्यकता है।
आरएच- 9801
गेहूं की बिजाई के समय तक इसकी बिजाई कर सकते हैं। इसकी पैदावार 15 से 20 मण प्रति एकड़ है। इस किस्म में पाला मारने का खतरा कम रहता है।
सरसों की फसल के लिए पानी की आवश्यकता है
सरसों की सभी किस्मों के लिए कम से कम एक पानी की आवश्यकता है। बिजाई के 35 से 40 दिन बाद फसल में पहला पानी लगाएं। अगर जमीन रेतीली है तो जब फसल में फली लगनी शुरू हो जाए तो दूसरा पानी लगा सकते हैं।
सिंचित भूमि के लिए खाद
सिंचित भूमि के लिए 32 किलोग्राम नाइट्रोजन, 12 किलोग्राम फासफोर्स और 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति एकड़ के हिसाब से डालें। 16 किलोग्राम नाइट्रोजन, 12 किलोग्राम फासफोर्स और 10 किलोग्राम जिंक बिजाई से पहले डालें। शेष 16 किलोग्राम नाइट्रोजन सिंचाई के दौरान डालें।
बिरानी भूमि के लिए खाद
बिरानी भूमि के लिए 12 किलोग्राम फासफोर्स, 10 किलोग्राम जिंक और 16 किलोग्राम नाइट्रोजन डालें। बाकी 16 किलोग्राम नाइट्रोजन 40 से 45 दिन बाद अगर जमीन में नमी है तो डाल सकते हैं। अगर नमी नहीं हे तो नाइट्रोजन न डालें।
कैसे करें जमीन तैयार
सरसों की बिजाई के लिए सबसे पहले खेत को समतल करके गहरी जुताई करें। अगर जमीन ऊंची नीची होगी तो पानी पूरी फसल में नहीं पहुंच पाएगा। जिससे पैदावार कम होगी।
फसल में सही समय रोग की पहचान कर लें अधिक पैदावार
सरसों रबी की प्रमुख फसल है। खाद्य तेलों की बढ़ती मांग के अनुपात में उसका उत्पादन काफी कम है। रोग एवं कीट का प्रकोप उत्पादन में कमी का प्रमुख कारण है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि सही समय पर फसल सुरक्षा उपाय अपनाकर सरसों की अच्छी पैदावार ली जा सकती है।
उखेड़ा आने पर फसल होती है खराब
सरसों के तनों पर लंबे व भूरे जलसिक्त धब्बे बन जाते हैं। जिन पर बाद में सफेद फफूंद की तह बन जाती है। यह सफेद फफूंद पत्तियों, टहनियों तथा फलियों पर भी नजर आ सकते हैं। उग्र आक्रमण यदि फूल निकलने या फलियां बनने के समय पर हो तो तने टूट जाते हैं और पौधे मुरझा जाते हैं। रोगग्रस्त पौधों के तनों के ऊपर और भीतर तथा जड़ों पर काले रंग के पिंड बनते हैं। उखेड़ा से बचाव के लिए दो ग्राम कारबेन्डाजिम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें। साथ ही उखेड़े के लक्षण दिखते ही डाइथेम एम 45 का छिड़काव फसल पर दो बार 15 दिन के अंतर पर करें। ऐसा करके किसान उखेड़े से फसल को बचा सकते हैं।
सफेद रतुआ
यह सरसों का भयानक रोग है। आरंभ में पत्तियों की निचली सतह पर उभरे हुए चमकीले सफेद फफोले तथा ऊपरी सतह पर इनका रंग पीला दिखाई देते हैं। बाद में यह तनों, फूलों व फलियों पर पड़ता है। इससे फलियों के स्थान पर हरी पत्तियों का गुच्छा सा बन जाता है, जिनमें कोई भी दाना नहीं बनता।
फिलोडी या मरोडिया
इस रोग में पौधे बेढंगे और झाड़ी के आकार के हो जाते हैं तथा फूलों की जगह पत्तियां सी आ जाती हैं।
आल्टर नेरिया ब्लाइट
पौधे के पत्तों, तनों, फलियों पर गोल-भूरे रंग के धब्बे हो जाते हैं। बाद में धब्बे काले रंग के हो जाते हैं तथा इनमें गोल-गोल छल्ले नजर आते हैं। इन दोनों रोगों की रोकथाम के लिए इन सभी रोगों की रोकथाम के लिए फसल के रोगग्रस्त अवशेषों को नष्ट करें। बीमारी के लक्षण आते ही मैंकोजेब की 600 ग्राम मात्रा को 250 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ छिड़काव 15 दिन के अंतर पर करें।
तेला व चेपा
हल्के पीले-हरे रंग का यह कीट छोटे-छोटे समूहों में रहकर पौधे के विभिन्न भागों से रस चूसकर पौधे को नुकसान पहुंचाता है इसकी रोकथाम के लिए रोगग्रस्त टहनियों को तोड़कर नष्ट कर दें। 250-400 मिली मैटासिस्टाक्स 25 ईसी या डाइमेथोएट (रोगोर) 30 ईसी को 250-400 लीटर पानी में मिलाकर प्रति एकड़ 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें।
कम खर्च की फसल गेहूं पर पड़ती है भारी
सरसों गेहूं के मुकाबले कम खर्चे की फसल है। वहीं सरसों के लिए अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती। जहां गेहूं की फसल के लिए चार से पांच पानी की आवश्यकता होती है तो सरसों के लिए एक पानी काफी है। रेतीली जमीन में दो पानी की आवश्यकता पड़ती है। गेहूं से करीब दोगुना भाव होने के कारण ये फसल गेहूं के मुकाबले ज्यादा फायदेमंद है। साथ ही सरसों की फसल के लिए बेहद कम कीटनाशक का प्रयोग करना पड़ता है। गेहूं में तीन चार स्प्रे की आवश्यकता होती है लेकिन सरसों में केवल एक स्प्रे किया जाता है।
सरसों की फसल में अधिक मजदूरी भी नहीं लगती। सरसों की बिजाई से लेकर कटाई तक चार पांच हजार की मजदूरी लगती है। साथ ही सरसों की कटाई भी आसान है। अधिकतर किसान सरसों के तूड़े में ही फसल की कटाई और कढ़ाई करवाते हैं। सरसों की फसल टाइम से कटाने पर किसान अगेती कपास की बिजाई भी कर सकते हैं। वहीं सरसों की फसल की कटाई के समय खेतिहर मजदूरों के पास अधिक काम नहीं होने के कारण किसानों को मजदूर भी आसानी से मिल जाते हैं।
क्या कहते हैं किसान
कई किसान सरसों की प्राइवेट किस्म की बिजाई करते हैं। इसका मुख्य कारण है कि सरकारी किस्म की अच्छे से ब्रांडिग नहीं होती जिससे किसानों को नई किस्मों का पता नहीं लगता।
राजकुमार सहरावत, गांव न्याणा
सरसों की फसल से अच्छी आमदनी होती है। साथ ही इसमें अधिक मेहनत की आवश्यकता नहीं होती। बिरानी एरिए के लिए सरसों की फसल कारगर साबित होती है। जिस जमीन में गेहूं की फसल 20 से 30 मण प्रति एकड़ तक रह जाती है। उसी जमीन पर सरसों की फसल 25 से 30 मण होती है।
अजमेर सिंह, गांव चिड़ौद
कई सालों से टिब्बे में भी सरसों की फसल की बिजाई कर रहे हैं। फव्वारों की मदद से सरसों की बिजाई की जाती है और अच्छी पैदावार होती है। एक एकड़ में 30 से 35 हजार की कमाई हो जाती है।
कृष्ण श्योराण, गांव चिड़ौद
गेहूं के मुकाबले सरसों की अधिक बिजाई करते हैं। नहरी पानी नहीं होने के कारण गेहूं की फसल नहीं होती। वहीं सरसों केवल एक पानी में ही हो जाती है। इसमें खर्च भी कम है।
साहब सरदार, गांव न्याणा