रेवाड़ी। देश की धरती से 16 अगस्त को मेडल लाने की चाहत लेकर टोक्यो के लिए रवाना हुए रेवाड़ी के बावल निवासी टेकचंद शुक्रवार को चार मिनट के अंदर ही मेडल की रेस से बाहर हो गए। लेकिन विदेशी जमीन पर भारतीय दल का ध्वजवाहक बनकर उन्होंने सबका दिल जरूर जीत लिया है।
तीन साल तक ज्वैलिन में पसीना बसाने वाले टेकचंद को महज कुछ दिनों पहले यदि शॉटपुट नहीं थमाया जाता तो मेडल जीतने की उम्मीद काफी ज्यादा थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। शुक्रवार को हुए शाट पुट के मुकाबले में टेकचंद ने 9.04 मीटर गोला फेंका और उनका प्रदर्शन बेहतर रहा। मां विद्या देवी सहित पूरे परिवार के लोग टीवी पर टकटकी लगाकर बैठे थे। लेकिन उनमें मेडल नहीं मिलने से ज्यादा खेल बदलने का मलाल ज्यादा दिखाई दिया। टेकचंद एफ 54 कैटेगरी में भाला फेंक की तैयारी में ही जुटे हुए थे। टोक्यो जाने के पश्चात पैरालंपिक कमेटी की ओर से भी कैटेगरी जांच की जाती है। कमेटी ने जांच के पश्चात टेकचंद की कैटेगरी एफ 54 की बजाय एफ 55 कर दी थी।
मां बोली- तिरंगा थामते ही हो गई थी जीत
दोपहर साढ़े 3 बजे शॉटपुट का मुकाबला शुरू हो गया था। शाम चार बजकर सात मिनट पर टेकचंद तीसरे नंबर पर गोला फेंकने पहुंचे थे। इससे पहले ब्राजील के खिलाड़ी 12.63 मीटर गोला फेंककर विश्व रिकॉर्ड बना चुके थे। ऐसे में टेकचंद की चुनौती दोगुनी हो गई थी। खेल बदलने का दबाव साफ टेकचंद के चेहरे पर दिख रहा था। बावजूद इसके टेकचंद ने बेहतर प्रदर्शन किया। मां विद्या देवी ने अमर उजाला से बातचीत में कहा कि मेडल मिलने का दुख नहीं है। जिस दिन टेकचंद ने तिरंगा हाथ में लेकर विदेशी जमीन पर भारत का प्रतिनिधित्व किया था, जीत उसी दिन मिल गई थी। वहीं भाई दुलीचंद ने कहा कि मेडल की आस थी, लेकिन खेल बदलने से परेशानी हुई। भाई ने कहा कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद टेकचंद ने बेहतर प्रदर्शन किया है।