कोसली। जिले का ऐतिहासिक गांव कोसली अपनी वीरता, धार्मिक आस्था और सदियों पुरानी सामाजिक परंपराओं के कारण प्रदेशभर में अलग पहचान रखता है। यहा सैनिकों और प्राचीन मंदिरों की संख्या अधिक है जिससे इसे मंदिरों और सैनिकों का गांव भी कहा जाता है।
करीब 800 वर्ष पुराने इस गांव की स्थापना दिल्ली के महाराजा आनंदपाल तोमर के पुत्र कौशल देव सिंह ने बाबा मुक्तेश्वर पुरी के आशीर्वाद से की थी। आज भी यहां की परंपराएं, सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक आस्था लोगों के जीवन में जीवंत दिखाई देती हैं। उस समय गांव के चारों ओर घना जंगल हुआ करता था, जहां शेर और चीते घूमते थे।
कर्म सिंह ने बताया कि कोसली गांव की सामाजिक अहमियत सदियों से बनी हुई है। आसपास 12 गांव हैं जिन्हें कोसलिया खेड़ा कहा जाता है। इन गांवों के सामाजिक और पारिवारिक मामलों का समाधान आज भी कोसली में ही किया जाता है। गांव की पुरानी परंपराएं और सामाजिक व्यवस्था आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा बनी हुई हैं।
देशभर से कोसलिया गोत्र के लोग हर साल होली पर बाबा मुक्तेश्वर पुरी महाराज के मठ में माथा टेकने पहुंचते हैं। यहां श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।
मंदिर परिसर में वर्ष में दो बार लगता है मेला
अशोक यादव ने बताया कि गांव में स्थित देवी माई के मंदिर में वर्ष में दो बार मेले का आयोजन होता है। इस मेले में दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं। नवजात बच्चों के मुंडन संस्कार और नवविवाहित जोड़ों की जात भी यहां लगाई जाती है। इसके अलावा गांव में प्राचीन शिव मंदिर, शनि देव मंदिर, ठाकुर जी मंदिर, गोगाजी मंदिर और बलखड़ी मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी मौजूद हैं, जहां सुबह-शाम श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते है।
सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है गांव
दयावान ने बताया कि कोसली गांव अपनी अनूठी सांस्कृतिक परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। आधुनिकता के दौर में जहां कई पारंपरिक त्योहार और लोक संस्कृतियां धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं, वहीं कोसली में आज भी सदियों पुरानी परंपराएं जीवित हैं। नवजात शिशु के जन्म पर कुआं पूजन की रस्म आज भी उसी परंपरा के साथ निभाई जाती है, जैसी करीब 800 वर्ष पहले निभाई जाती थी।
गांव में होली गायन की परंपरा है बेहद खास
सरपंच रामकिशन जांगड़ा ने बताया कि गांव में होली गायन की परंपरा बेहद खास है। महाशिवरात्रि से शुरू हुआ होली गीतों का दौर होली तक चलता है। पीढ़ी दर पीढ़ी पुराने लोकगीतों को उसी शैली में गाया जाता है, जैसे सैकड़ों वर्ष पहले गाए जाते थे। ग्रामीणों के अनुसार सदियों पहले गांव पर एक डाकू ने अपने साथियों के साथ हमला कर दिया था। ग्रामीणों ने साहस दिखाते हुए डाकुओं के सरदार का सिर कलम कर दिया था। इसी विजय की खुशी में फाग पर्व पर विशेष आयोजन किया जाता है। गांव का धना नाई, मठाधीश महाराज, नंबरदार और ग्रामीण ठाकुर जी की प्रतिमाओं को सजाकर चौपाल से मठ तक ले जाया जाता है। इसके बाद फाग मेले की शुरुआत होती है। मेले में आने वाले चढ़ावे का हिसाब आज भी सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार रखा जाता है। चौपाल में बैठकर चढ़ावे की राशि गिनी जाती है और करीब 800 से 900 वर्ष पुरानी बहियों में उसका लेखा-जोखा दर्ज किया जाता है। यही परंपराएं कोसली गांव को सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक आस्था का जीवंत उदाहरण बनाती हैं।