रेवाड़ी। गांव मामड़िया ठेठर की करीब 73 वर्षीय शीला यादव करीब 40 वर्षों से घर के आंगन में फूलों की बगिया तैयार की हैं। इस उम्र में भी उनका अधिकतर समय पौधों और फूलों की देखभाल में बीतता है। बगिया में गुलाब, गुलदावदी, गेंदा, गुड़हल सहित कई तरह के रंग-बिरंगे फूल खिले रहते हैं जो आसपास के वातावरण को सुगंधित और मनमोहक बना देते हैं।
शीला यादव ने बताया कि उन्हें बचपन से ही पौधों और प्रकृति से विशेष लगाव है। इसी लगाव के चलते उन्होंने वर्षों पहले अपने घर में छोटी-सी बगिया बनानी शुरू की थी जो आज एक खूबसूरत फूलों के बगीचे का रूप ले चुकी है। बगिया की देखभाल में उनके पति कैप्टन ओमप्रकाश यादव और पुत्र धर्मेंद्र कुमार भी सहयोग करते हैं।
शीला यादव सुबह-शाम पौधों को पानी देने, उनकी छंटाई करने और नई पौध तैयार करने का काम खुद ही करती हैं। उनका कहना है कि पौधों के साथ समय बिताने से मन को शांति और सुकून मिलता है। फूलों की खुशबू से वातावरण भी शुद्ध और सकारात्मक बना रहता है। शीला यादव अपनी बगिया में रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करतीं हैं।
पौधों के लिए वे प्राकृतिक खाद का ही प्रयोग करती हैं। आसपास स्थित गोशाला से मिलने वाले गाय के गोबर से वे खाद तैयार करती हैं। इसके अलावा घर के किचन से निकलने वाले जैविक कचरे जैसे सब्जियों के छिलके आदि से भी खाद बनाकर पौधों में डालती हैं। इससे पौधे स्वस्थ रहते हैं और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता।संवाद
इंसेट
फूलों का धार्मिक, औषधीय और पर्यावरणीय महत्व
शीला यादव बताती हैं कि बगिया में खिले फूलों का धार्मिक, औषधीय और पर्यावरणीय महत्व भी है। गुलाब और गुड़हल जैसे फूलों का उपयोग पूजा-पाठ में किया जाता है। वहीं कई फूलों में औषधीय गुण भी पाए जाते हैं। इसके अलावा ये फूल वातावरण को शुद्ध करने और जैव विविधता को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका कहना है कि फूलों की देखभाल करना उनके लिए किसी साधना से कम नहीं है। सुबह और शाम जब बगिया में फूल खिलते हैं और उनकी महक चारों ओर फैलती है, तो मन बेहद प्रसन्न हो जाता है। इस उम्र में उनकी यह बगिया ही उनके लिए सहारा और खुशी का सबसे बड़ा जरिया बन गई है। लोगों से अपील है कि वे अधिक से अधिक पौधे लगाएं और प्रकृति से जुड़ें।