आज पूरा देश नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उनकी जयंती पर उन्हें नमन कर रहा है। सामाजिक संस्थाएं हों या राजनीतिक दल, सभी ने बोस की यादों को ताजा करने और युवा पीढ़ी तक नेता जी के कारनामों को पहुंचाने के लिए अलग-अलग कार्यक्रम आयोजित किए हैं।
ऐसे में अगर दक्षिण हरियाणा की अहीरवाल, जिसे सैनिकों की खान कहा जाता है, उसका जिक्र नहीं किया जाए तो यह उन वीर शहीदों के साथ नाइंसाफी होगी, जोकि देश के लिए अपना अमूल्य जीवन कुर्बान करके हमें आजादी की हवा में सांस लेने का अनमोल मौका उपलब्ध करा गए।
हरियाणा के रेवाड़ी में नेताजी से जुड़े सैनिक उस वक्त रहे हैं, जिनमें से काफी आजाद हिंद फौज, ब्रिटिश सेना से बागी होकर आईएनए में शामिल होने वाले या वो शहीद जिन्होंने किसी भी रूप में आजादी के लिए जंग लड़ने वालों की मदद की या अंग्रेजी हुकूमत की नजर में उनके मददगार साबित हुए। ऐसे ही लोगों में एक हैं जिले के गांव टूमना निवासी 102 साल के ओंकार सिंह, जिनको जिंदा शहीद कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।
उनके परिवार में पोते भूपेंद्र, उनकी पत्नी और पड़पोता दक्ष शामिल हैं। कुछ समय पहले वे रेवाड़ी शहर के मार्स अस्पताल में बीमारी की वजह से दिसंबर में उपचार के लिए दाखिल कराए गए थे। उस वक्त उनका सारा इलाज निशुल्क हुआ, अब सेहतमंद होकर अपने घर लौट गए। उनके पोते भूपेंद्र बताते हैं कि बाबा ओंकार उनको नेता जी सुभाष चंद्र बोस, द्वितीय विश्व युद्घ समेत अन्य किस्से सुनाते हैं।
अधिक उम्र होने की वजह से बाबा ओंकार की आंखों की रोशनी अब कम हो गई है लेकिन वे अपने पड़पोते को अच्छी तरह पहचानते हैं और अपने परिवार के सदस्यों को भी देखते ही पहचान लेते हैं। दक्ष पेशे से जिम ट्रेनर के तौर पर जॉब करते हैं, जिससे इस परिवार को कुछ आय मिलती है। इसके अलावा करीब 50 हजार रुपये बाबा ओंकार सिंह को सरकार की ओर से पेंशन भी मिलती है।
उनके दस्तावेजों को देखकर यह साफ जाहिर होता है कि वे द्वितीय विश्व युद्घ के वक्त नेता जी के साथ थे। रेजांगला शौर्य समिति के संयोजक एडवोकेट नरेश चौहान ने बताया कि इस पूर्व सैनिक के एक लड़का और चार लड़कियां हैं। इनकी दो शादियां हुई। द्वितीय विश्व युद्घ की काफी घटनाएं उनको अभी तक याद हैं।
द्वितीय विश्व युद्घ के दौरान नेता जी के साथ इनका जुड़ाव रहा। वे आर्टिलरी में नायक रैंक पर थे। आईएनए से 12 मार्च 1942 को भर्ती हुए थी। उनकी जन्मतिथि 12 मई 1919 जोकि प्रमाणित रिकॉर्ड के अनुसार दर्ज है। भूपेंद्र बताते हैं कि बाबा की दो शादियां र्हुइं।
पहली पत्नी से बेटी चंद्रकला ने जन्म लिया। दूसरी पत्नी गोदावरी जिंदा हैं, उनसे दो लड़के और तीन लड़कियां हुई। एक लड़का अविवाहित चल बसा। दूसरा लड़का महा सिंह भी चल बसा। उसके बेटे भूपेंद्र हैं और भूपेंद्र सिंह का बेटा दक्ष जोकि बाबा ओंकार का पड़पोता है। गोदावरी बताती हैं ओंकार सिंह काफी-काफी समय बाद घर आते थे। परिवार में उस वक्त इतनी आमदनी नहीं थी। गुजारा बामुश्किल चलता है। परिवार ने काफी परेशानियां झेली। अब पड़पोता दक्ष उक्त पूर्व सैनिक की विरासत को आगे बढ़ाएगा।
गुमनाम शहीदों को पहचान दिलाने में जुटे हैं फौगाट
चरखी दादरी के गांव ढाणी फौगाट के श्री भगवान फौगाट गुमनाम शहीदों को पहचान दिलाने में जुटे हैं। इनमें नेताजी के साथ लड़ने या मदद करने वाले, ब्रिटिश अदालतों में उनके मददगार साबित लोग शामिल हैं, जिन्हें सरकार ने शहीद का दर्जा नहीं दिया। फौगाट के मुताबिक रेवाड़ी में उनकी ओर से करीब 14 गुमनाम शहीदों के नाम ढूंढ कर प्रशासन को उपलब्ध कराए गए हैं, जिनको शहीद का दर्जा देने का काम चल रहा है। रोहतक और झज्जर जिले में यह काम जिला प्रशासन की ओर से किया गया। हिसार का प्रशासन भी इस विषय में सरकार के नक्शे कदम पर चल रहा है मगर जिला रेवाड़ी प्रशासन की ओर से सरकार से पत्र व्यवहार में देरी होने से यह काम मध्यम गति से चल रहा है। रेवाड़ी में गांव झाबुआ के मूलचंद, फूलाराम, गांव प्राणपुरा के पीमाराम, सुलखा के जागेराम, मोतला खुर्द के रामचंद्र, डवाना के सिंहराम, निमोठ के मंगल सिंह, खरखड़ा के अमर सिंह, मोहदीनपुर के मामन सिंह, कंवाली के मोहल्लड़ सिंह का नाम शहीद जवानों में दर्ज मिला।