सिविल अस्पताल में पिछले आठ माह में गर्भ में और डिलिवरी के बाद 77 नवजातों की मौत हो चुकी है। हर माह औसतन 11 नवजातों की मौत हो रही है। कोरोना की दूसरी लहर अप्रैल, मई और जून में पीक पर थी। इन तीन माह में ही 34 नवजातों की मौत हुई है। इन मौतों की वजह कोरोना के दौरान गर्भवतियों समय पा जांच नहीं हो पाना और गर्भवतियों में जागरूकता की कमी रही।
कोरोना पीक के दौरान गर्भवती महिलाओं को समय पर इलाज नहीं मिला। महिलाओं को डिलिवरी के लिए कोरोना की रिपोर्ट दिखाना जरूरी था। कई दिन तक गर्भवतियों डिलिवरी के लिए भटकी रही थीं। इस वजह इन तीन माह में सबसे अधिक नवजातों की मौत हुई। इन तीन माह में सिविल अस्पताल में मात्र 1517 महिलाओं की डिलिवरी हुई, जबकि आमतौर पर सिविल अस्पताल में हर माह औसतन 1200 महिलाओं की डिलिवरी होती है। पिछले आठ माह में सिविल अस्पताल में 5391 महिलाओं की डिलिवरी हुई है।
जनवरी से अगस्त तक 77 नवजातों की जान गई है। इनमें से 55 प्रतिशत बच्चे ग्रामीण क्षेत्रों और 45 प्रतिशत बच्चे पिछड़ी कॉलोनियों के थे। इन क्षेत्रों में आज भी जागरूकता की कमी है। आज भी इन क्षेत्रों में दाइयां सक्रीय हैं। घर पर प्रसव पर भी अंकुश नहीं लगा है।
सिविल अस्पताल के प्रसूति वार्ड में काम करने वाली स्टॉफ नर्सों का कहना है कि गर्भवतियों के परिजन गर्भवतियों को तब अस्पताल में लेकर आते हैं, जब वे दर्द से बेहाल हो जाती हैं। महिलाओं को ई- रिक्शा या ऑटो में लाया जाता है। काफी महिलाएं रास्ते में ही बच्चे को जन्म दे देती हैं। ऐसे में कई बच्चों की मौत भी हो जाती है। गर्भवतियों को जागरूक किया जा रहा है कि वे डिलिवरी से कम से कम 24 घंटे पहले अस्पताल में आएं।
माह डिलिवरी बच्चों की मौत
जनवरी 812 9
फरवरी 655 7
मार्च 691 10
अप्रैल 538 11
मई 450 12
जून 529 11
जुलाई 872 8
अगस्त 844 9
- दर्द ज्यादा देर तक चलता रहे और जन्म नहीं दे पाना
- बच्चे का वजन ज्यादा होने से बाहर आने का रास्ता कम होना
- महिलाएं जांच नहीं करातीं हैं, सीधा डिलिवरी के लिए आती हैं
- महिलाओं में खून की कमी
- शुगर और बीपी की दिक्कत
स्वास्थ्य विभाग गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य की तरफ काफी ध्यान देता है। गर्भवती महिलाओं के लिए सरकार सीएचसी पीएचसी स्तर पर शिविर लगाती है। बच्चे के शरीर के पूरे अंग बनने के लिए फोलिक एसिड दिया जाता है। तीन माह के बाद इन्हें कैल्शियम आयरन की गोलियां दी जाती हैं। डिलिवरी होने तक प्रत्येक महिला के लिए स्वास्थ्य केंद्र पर 360 गोलियां पहुंचती हैं। इतनी ही गोलियां उनकी डिलिवरी के बाद उन्हें दी जाती हैं। मगर जागरूकता की कमी लापरवाही के कारण अब भी 60 प्रतिशत महिलाओं में खून की कमी है। जब महिलाएं ही पूरी तरह स्वस्थ नहीं होंगी तो नवजात कैसे स्वस्थ हो सकता है। विभाग अपनी तरफ से हर संभव प्रयास कर रहा है।
- डॉ. निशि जिंदल, डिप्टी सिविल सर्जन पानीपत