पानीपत। श्री गुरु तेग बहादुर जी के 400वें प्रकाश पर्व प्रबंधन कमेटी के चेयरमैन एवं हरियाणा के खेल मंत्री संदीप सिंह ने बताया कि गुरु तेग बहादुर साहिब जी के धर्म प्रचार से उनकी शहीदी और शीश यात्रा का बखान किया। उन्होंने बताया कि गुरु तेग बहादुर जी हरियाणा के आठ से ज्यादा जिलों में आए और संगतों को अपनी वाणी का प्रसाद दिया।
प्रदेश के आठ जिलों में जहां-जहां श्री गुरु तेग बहादुर जी के चरण पड़े वहां पर उन जिलों में लगभग 26 गुरुद्वारा साहिब से युवा पीढ़ी को संस्कृति और संस्कारों का ज्ञान मिल रहा है। इस पावन धरा पर श्री गुरु तेग बहादुर जी के आदर्शों, सिद्धांतों, मानवीय मूल्यों को आगे बढ़ाने के लिए हरियाणा सरकार ने पानीपत की धरा पर श्री गुरु तेग बहादुर जी का 400वां प्रकाशोत्सव बडे हर्षोल्लास के साथ मनाया है।
करतार पुर साहिब से शुरू की यात्रा, दिल्ली में हुई शहीदी
उन्होंने बताया कि गुरु तेग बहादुर जी ने जून 1656 में करतारपुर साहिब से पहली धर्म प्रचार यात्रा सातवें गुरु हर राय साहब जी के हुक्म के साथ शुरू की। गुरु तेग बहादुर साहिब जी हरियाणा के अंबाला, कुरुक्षेत्र, यमुनानगर एवं करनाल आदि इलाकों से धर्म प्रचार का कार्य करते हुए पटना साहिब पहुंचे। पटना साहिब से वापसी करते हुए 21 मार्च 1664 ईस्वी को दिल्ली से हरियाणा के रोहतक, जींद, अंबाला होते हुए बाबा बकाला नगर, अमृतसर पहुंचे। गुरु पदवी पर रहते हुए अप्रैल 1665 ईस्वी में गुरु तेग बहादुर साहिब साबो की तलवंडी से कैथल, कुरुक्षेत्र, अंबाला से धर्म प्रचार करते हुए कीरतपुर साहिब पहुंचे।
अगस्त 1665 में आनंदपुर साहिब से हरियाणा के कैथल, जींद एवं धमतान साहिब कई दिन धर्म प्रचार का कार्य किया और पटना, असम, बंगाल तक प्रचार-प्रसार किया। असम से वापसी पर नवंबर 1670 ईस्वी में दिल्ली पहुंचे और हरियाणा के सोनीपत, रोहतक, जींद के रास्ते से आनंदपुर साहिब पहुंचे। 11 नवंबर 1675 को गुरु तेग बहादुर साहिब की शहीदी कोतवाली चांदनी चौक दिल्ली में हुई।
वहां से भाई जैता जी पवित्र शीश लेकर दिल्ली से बागपत हरियाणा के तरावड़ी, पिहोवा, अंबाला के रास्ते आनंदपुर साहिब पहुंचे। 1 जून 1656 कीरतपुर साहिब से हरियाणा प्रदेश के रास्ते पटना साहिब, मार्च 1664 पटना साहिब से दिल्ली, दिल्ली से हरियाणा प्रदेश के रास्ते बकाला में पंजाब पहुंचे। अप्रैल 1665 बकाला नगर से साबो की तलवंडी से हरियाणा प्रदेश के धमतान साहिब के रास्ते कीरतपुर साहिब पहुंचे। नवंबर 1665 आनंदपुर साहिब से हरियाणा प्रदेश के धमतान साहिब, दिल्ली, पटना साहिब, आसाम एवं बंगाल पहुंचे। नवंबर 1670 पटना साहिब से दिल्ली यहां से हरियाणा प्रदेश के रोहतक के रास्ते आनंदपुर साहिब पहुंचे।
जहां रखा शीश, वहां बना गुरुद्वारा- संदीप सिंह
खेल मंत्री संदीप सिंह ने बताया कि भाई जैता जी के द्वारा शीश यात्रा दिल्ली से बागपत हरियाणा के तरावड़ी, कुरुक्षेत्र, अंबाला के रास्ते आनंदपुर साहिब पहुंचे, नवंबर 1675 ईस्वी में शीश यात्रा दिल्ली से बागपत हरियाणा प्रदेश के तरावड़ी, कुरुक्षेत्र, अंबाला के रास्ते आनंदपुर साहिब पहुंची।
उन्होंने कहा कि भाई जैता जी के द्वारा नवंबर 1675 ईस्वी को श्री गुरु तेग बहादुर जी के शीश की यात्रा दिल्ली से बागपत हरियाणा प्रदेश के तरावड़ी, कुरुक्षेत्र, अंबाला के रास्ते आनंदपुर साहिब पहुंची। भाई जैता जी ने जिन जिन स्थानों पर श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी का शीश रखा। वहां पर गुरु तेग बहादुर जी की याद में गुरुद्वारा साहिब सुशोभित हैं।
रंगरेटे गुरु के बेटे का दिया खिताब, तब बनी मजहबी सिख कौम
भाई जैता जी जब आनंदपुर साहिब श्री गुरु तेग बहादुर साहिब का शीश लेकर पहुंचे तो वहां पर श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने भाई जैता जी को अपने गले से लगाते हुए रंगरेटे गुरु के बेटे का खिताब दिया। भाई जैता जी की इस बहादुरी के परिणाम स्वरूप श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी ने रंगरेटा कौम को जिसे मजहबी सिख कौम भी कहा जाता है। श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी के शीश को भाई जैता जी ने जिन-जिन स्थानों पर रखा, सभी स्थान वर्तमान हरियाणा में ही आते हैं।