पानीपत। अब सिविल अस्पताल में दर्द और बड़ा चीरा रहित मोतियाबिंद की सर्जरी करने के प्रयास शुरू हो गए हैं। सर्जरी के लिए कंडम फेको मशीन को ठीक कराया जाएगा। सिविल सर्जन डॉ. जयंत आहूजा खुद नेत्र रोग विशेषज्ञों को प्रशिक्षण भी देंगे ताकि फेको मशीन से सर्जरी हो सके। लोगों को इस सर्जरी के लिए खानपुर और करनाल मेडिकल कॉलेज रेफर न करना पड़े।
सरकार ने स्वास्थ्य विभाग को 14 साल पूर्व 2008 में फेको मशीन दी थी। इस मशीन से उच्च तकनीक के जरिये बिना टांकों की सर्जरी होनी थी। इसके लिए तत्कालीन सर्जन डॉ. आशुतोष को जयपुर मेंट्रेनिंग भी दिलाई गई थी। ट्रेनिंग पर एक लाख रुपये खर्च भी आया था। हैरत की बात यह है कि 15 लाख की इस मशीन से एक भी सर्जरी नहीं हुई। ये पैकिंग में ही कंडम हो गई।
फेको मशीन से मोतियाबिंद के उपचार के लिए बड़े चीरे की आवश्यकता नहीं होती। आंख में महज 2.8 एमएम का बारीक छेद किया जाता है। मशीन के माध्यम से मोतिया को आंख के अंदर ही घोल दिया जाता है। मशीन के जरिये ही फोल्डेबल लेंस को आंख के अंदर प्रत्यारोपित कर देते हैं। इसे टापिकल माइक्रो फेको तकनीक कहते हैं। कोई इंजेक्शन नहीं लगाया जाता। दवा की कुछ बूंदें डाली जाती हैं। ऑपरेशन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बिना दर्द इस आपरेशन के बाद मरीज को आंखों पर पट्टी भी बांधनी नहीं पड़ती।
सिविल सर्जन डॉ. जयंत आहूजा ने डिप्टी सिविल सर्जन डॉ. बिजेंद्र हुड्डा को निर्देश दिया है कि वो दिल्ली से इंजीनियर बुलाकर मशीन की जांच कराएं। मशीन आज तक पैकिंग में ही है, इसलिए उसमें खराबी आने की संभावना कम है। मशीन को ठीक कराकर नेत्र रोग विशेषज्ञों को वो प्रशिक्षण देंगे और यहीं पर फेको से सर्जरी शुरू कराई जाएगी।
मशीन को जल्द ठीक कराने का प्रयास : सिविल सर्जन
फेको मशीन की जांच कराई जाएगी। मशीन अगर खराब मिलती है तो उसे ठीक कराया जाएगा। डॉक्टरों को प्रशिक्षण देकर फेको मशीन से मोतियाबिंद की सर्जरी शुरू कराएंगे।
- डॉ. जयंत आहूजा, सिविल सर्जन पानीपत।