चंडीगढ़। सेक्टर-42 में ढाबा मालिक की हत्या के मामले में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने नौकर को निर्दोष करार देते हुए उम्रकैद की सजा का आदेश रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि नौकर मौके से फरार था केवल इस आधार पर उसे दोषी करार नहीं दिया जा सकता। इस मामले में न तो कोई प्रत्यक्षदर्शी है, न कोई फिंगर प्रिंट और न ही अन्य कोई पुख्ता सबूत जो याची को दोषी करार देने के लिए काफी हो। चंडीगढ़ के सेक्टर-42 के रहने वाले ईश्वर ने सेक्टर-36 थाना पुलिस को शिकायत दी थी कि उसके पिता महिपाल सेक्टर-42 के बिजली दफ्तर के पास ढाबा चलाते थे। ढाबे पर उसका छोटा भाई और एक नाबालिग लड़का भी काम करता था। वारदात से 20 दिन पहले ढाबे पर काम करने के लिए असाम के डिब्रूगढ़ से मौलिक दास विजय आया था। सभी रात को बिजली दफ्तर में सोते थे। 29 जून 2016 को विजय ने ढाबे पर काम करने वाले उस नाबालिग लड़के से मारपीट की, जिससे वह नौकरी छोड़ कर चला गया। उसके पिता महिपाल और विजय के बीच बहस भी हुई। 30 जून की रात ढाबा बंद करने के बाद उसके पिता और विजय बिजली दफ्तर में सोने के लिए चले गए। जब वह रात को ड्यूटी कर अगली सुबह अपने पिता से मिलने आया तो देखा कि वे खून से लहूलुहान पड़े थे। उनका गला चाकू से रेता हुआ था और मुंह पर भी चाकू के निशान थे। वारदात के बाद विजय फरार हो गया था। करीब 2 महीने बाद पुलिस ने डिब्रूगढ़ से उसे पकड़ लिया था। अपराध के समय विजय की उम्र 18 साल से कम थी। गंभीर अपराध की वजह से उसका केस सेशंस कोर्ट में ही चला। विजय को एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज राजीव गोयल की कोर्ट ने 30 जुलाई 2020 को दोषी करार दिया था। इस फैसले को याची ने हाईकोर्ट में एडवोकेट सलिल देव सिंह बाली के माध्यम से याचिका दाखिल करते हुए चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि इस मामले में याची के फिंगरप्रिंट हथियार पर मौजूद नहीं थे। जो बैग याची की निशानदेही पर बरामद दिखाया गया उसमें मौजूद कपड़ों पर जो खून था वह मृतक के खून से मैच नहीं हुआ। इस मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं है और जिस नौकर से झगड़े के बाद मृतक महिपाल से याची का झगड़ा हुआ उसे भी जांच में शामिल नहीं किया गया। ऐसे में इस मामले में अभियोजन पक्ष केस को साबित करने में नाकाम रहा। ऐसे में हाईकोर्ट ने बेनिफिट ऑफ डाउट के आधार पर याची को बरी करने का आदेश दिया है।