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Khelo India Youth Games: कोई पिता का कर्ज तो कोई गरीबों के लिए अकादमी खोलने को बना खिलाड़ी, प्रेरणादायक है इनकी कहानी

Tue, 07 Jun 2022 11:20 AM IST
निवेदिता वर्मा दीपक शाही, अमर उजाला, पंचकूला

सार

एक तरह खेल के मैदान में स्वर्णिम इतिहास रचते हैं तो दूसरी तरफ परिवार की जिम्मेदारी भी उठाते हैं। इनमें प्रदेश की बेटियां भी बेटों से कम नहीं हैं। कोई अपने भाई का पढ़ाई का खर्च उठा रहा है तो कुछ खिलाड़ी खेल में बेहतर प्रदर्शन के जरिए सरकारी नौकरी पाकर अपने पिता का कर्ज चुकाना चाहते हैं।
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खिलाड़ी इतु, उषा, सागर, प्रभात । - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
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विस्तार
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अगर जिंदगी को जिंदादिली से जीना है, तो खेलो इंडिया यूथ गेम्स में हिस्सा लेने पहुंचे हरियाणा के खिलाड़ियों से सीखिए। वे अथक प्रयासों से अपनी मंजिल तक पहुंचने के साथ अपने माता-पिता के अधूरे सपनों को भी पूरा कर रहे हैं। एक तरह खेल के मैदान में स्वर्णिम इतिहास रचते हैं तो दूसरी तरफ परिवार की जिम्मेदारी भी उठाते हैं। इनमें प्रदेश की बेटियां भी बेटों से कम नहीं हैं। कोई अपने भाई का पढ़ाई का खर्च उठा रहा है तो कुछ खिलाड़ी खेल में बेहतर प्रदर्शन के जरिए सरकारी नौकरी पाकर अपने पिता का कर्ज चुकाना चाहते हैं। वहीं एक खिलाड़ी गरीब बच्चों के लिए अकादमी खोलना चाहता है, ताकि उसके जैसे तमाम बच्चों को अपने मंजिल का चुनाव करने के लिए भटकना नहीं पड़े। 

गांव की अकादमी बंद हुई तो पिता ने बढ़ाया हौसला  

खेलो इंडिया यूथ गेम्स की सेक्टर-14 के गवर्नमेंट गर्ल्स पीजी कॉलेज में वेट लिफ्टिंग के 55 किलो भारवर्ग में स्वर्ण पदक जीतने वाली रोहतक की गांव मोरखेड़ी की उषा देश की लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने लगातार तीसरी बार खेलो इंडिया यूथ गेम्स में पदक जीता है। रोहतक की बेटी खेल में देश का नाम तो रोशन कर रही है, अपने पिता की जिम्मेदारियां भी पूरी कर रही हैं। उषा ने बताया कि उसे हर माह दस हजार रुपये स्कालरशिप मिलती है। उन पैसों से अपने छोटे भाई रमन की पढ़ाई का खर्च उठाती हैं। खुद 2024 में ओलंपिक में देश के लिए पदक और अपने भाई को सेना का अधिकारी बनाना चाहती हैं। उषा ने बताया कि उसके पिता सुरेंद्र कुमार इलेक्ट्रीशियन हैं। उसकी मां सपना हाउस वाइफ हैं।

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उषा ने बताया कि खेल उसने इसलिए चुना है कि उसके गांव में सिर्फ वेट लिफ्टिंग ही सिखाया जाता है। करीब तीन से चार साल पहले गांव की अकादमी अचानक बंद हो गई। उस समय उसकी हिम्मत डगमगा गई, घर से बाहर जाकर ट्रेनिंग करने के लिए पिता के पास इतने पैसे नहीं थे। उस समय पिता ने हौसला बढ़ाया और उषा उठ खड़ी हुई। दिल्ली में राजस्थान के राजगढ़ स्थित उर्मिला स्पोर्ट्स अकादमी के लिए ट्रायल दिया और वहां उसका चयन हो गया। जहां उसे फ्री में रहने और खाने के साथ ट्रेनिंग की भी सुविधा मिली। धीरे -धीरे वह आगे बढ़ती गई और आज वर्तमान में लखनऊ के नेशनल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में 2024 में होने वाले ओलंपिक की ट्रेनिंग कर रहीं हैं।

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ऑटो चालक के बेटे ने जीता स्वर्ण, पिता का कर्ज चुकाने के लिए बनेगा कोच

योगासन में आर्टिस्टिक ग्रुप के लड़कों के वर्ग में हिसार निवासी सागर ने अंडर-18 आयुवर्ग में स्वर्ण पदक हासिल किया है। सागर के पिता प्रदीप कुमार ऑटो चलाते हैं। सागर ने अपने माता-पिता के लिए कई सपने बुने हैं। वह सरकारी कोच बनकर अपने पिता का लाखों रुपये का कर्ज चुकाना चाहता है। उसने बताया कि उसके पिता ने अपनी दोस्त की बेटी की शादी के लिए अपने क्रेडिट पर बैंक और कुछ लोगों से ब्याज पर पैसे लेकर दिए थे, लेकिन वह लौटा नहीं पाए। अब उसके पिता कर्ज में डूब गए हैं। पूरे दिन ऑटो चलाते हैं तो बड़ी मुश्किल से सात से आठ सौ रुपये कमा पाते हैं। कुछ बैंक की किस्त में कट जाता और कुछ कर्ज चुकाने में। घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चलता है। ऐसे में गुरुग्राम के सरकारी स्कूल में 12वीं कक्षा में पढ़ने वाले सागर ने खेल के रूप में योग को चुना, ताकि आगे चलकर कोच बनकर पिता का कर्ज चुका सकें। इसमें डाइट का बहुत ज्यादा रोल नहीं है। बॉडी फ्लेक्सिबल होनी चाहिए। पैसे के अभाव के चलते सागर ने दूसरे खेलों की जगह योग पर फोकस किया। इससे पहले नेशनल में दो बार स्वर्ण और एक बार सिल्वर व राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में चार बाद स्वर्ण पदक जीत चुका है।

सिक्योरिटी गार्ड का बेटा बोला, गरीब बच्चों के लिए खोलूंगा फ्री अकादमी

योग में स्वर्ण पदक जीतने वाले गुरुग्राम के प्रभात कुमार ने बताया कि वह आगे पढ़ाई कर सरकारी योग कोच बनकर गरीब बच्चों के लिए एक फाउंडेशन खोलना चाहते हैं ताकि किसी बच्चे को पैसों के अभाव में पिछड़ना न पड़े। प्रभात ने बताया कि उसके पिता कमलेश राय सिक्योरिटी गार्ड का काम करते हैं। मां सीता देवी हाउस वाइफ हैं। उसे यह सीख उसके पिता से मिली है। उसने बताया कि उसके पिता पैसों के अभाव में 11वीं तक पढ़ पाए। प्रभात कोच देवेंद्र के पास योग की ट्रेनिंग ले रहा है।   

महज 13 साल की उम्र में बनी है प्रेरणा

झारखंड की इतु मंडल खेलो इंडिया यूथ गेम्स में देशभर से पहुंचीं कबड्डी टीम की सबसे युवा खिलाड़ी हैं। महज 13 साल की उम्र में इतु खेलो इंडिया यूथ गेम्स का हिस्सा बनी हैं। ट्रैक्टर ड्राइवर की बेटी इतु मंडल को कबड्डी से उस समय प्यार हो गया था, जब वह मात्र आठ साल की थी। उसने बताया कि महाराष्ट्र के खिलाफ पहले मैच के बाद उसके माता-पिता उसे लेकर चिंतित थे, लेकिन उसे कभी डर नहीं लगा। झारखंड के दुमका जिले के मधुबन गांव की इतु ने कहा, कि वह अपने परिवार में सबसे बड़ी बेटी हैं, लेकिन मेरे माता-पिता ने मुझे खुली छूट दी है। उन्होंने मुझ पर विश्वास किया, जिम्मेदारी लेने का कोई दबाव नहीं डाला। उसने बताया उसे खेल में लंबा सफर तय कर कोच बनना है। वह युवाओं के साथ काम करना चाहती है। कबड्डी से प्यार करने में उनकी मदद करना चाहती हैं। उसने बताया कि हाल के वर्षों में कबड्डी देश में एक बड़े खेल के रूप में उभरा है। 2016 में महिलाओं के लिए प्रोफेशनल कबड्डी लीग शुरू हुई थी। इसके बाद युवा लड़कियों का ध्यान खेल की तरफ आकर्षित हुआ था। 
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